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आमा—बूबू अब दादा—दादी, ईजा—बाबू बन गये मम्मी—पापा, मॉम—डैड, पहाड़ों में लुप्त हो रही कुमाउनी संस्कृति, कुमाउनी में बात करने में हिचक रही नौजवान पीढ़ी

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– दीपेंद्र जोशी –
पिथौरागढ़। कुमाउनी भाषा व संस्कृति के संरक्षण व उत्थान के लिए जहां आज विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रयास हो रहे हैं, वहीं हमारी भाषाई पहचान कुमाउनी समाज में दिन—प्रतिदिन अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। यह आने वाला इतना बड़ा संकट है, जिसके प्रति कुमाउनी भाषा संस्कृति की वकालत करने वालों को हर हाल में एकजुट होना पड़ेगा। कुमाऊं मंडल के तमाम जनपदों के स्कूल, कालेजों में आज एक सर्वेक्षण की जरूरत है। चूंकि हालात बद से बदतर हो गये हैं। वर्तमान दौर में कुमाउनी में बात करने वालों की संख्या में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है। पहाड़ी में ‘आमा—’बूबू’ अब ‘दादा’—’दादी’ बन चुके हैं। ‘ईजा—बाजू या बाबू’ का स्थान ‘मम्मी, मौम, पापा, डैड, डैडी’ ने ले लिया है। हर कुमाउनी तीज—त्योहारों में झोड़ा, छपेली, चांचरी, भगनौल जैसी प​रंपरा तो दूर प्रसिद्ध छोलिया ​नृत्य तक केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित होकर केवल मंचीय प्रस्तुति बन चुके हैं। सार्वजनिक रूप से देखने में आ रहा है कि आज की युवा पीढ़ी कुमाउनी में बात करना तो दूर कुमाउनी भाषा को समझ तक नहीं पा रही है। अपनी ही भाषा व संस्कृति से यह दूरी हमारे कुमाउनी समाज को भीतर तक खोखला कर रही है। जिसकी चिंता ना तो सरकार को है और ना ही कुमाउनी की वकालत करने वाले तथाकथित नेताओं को। आज कुमाऊं मंडल में कई संस्थायें व संगठन विभिन्न माध्यमों से कुमाउनी भाषा के प्रचार—प्रसार की बात कर रहे हैं। बावजूद इसके दुर्भाग्य की बात तो है कि यह संगठन भी केवल मीडिया की सुर्खियों में छाने और अपना हित साधने मात्र तक सीमित हैं। आज की पीढ़ी को अपनी भाषाई पहचान और सम्मान दिलाने की सख्त जरूरत है, नहीं तो आने वाले पीढ़ी वह पीढ़ी होगी जो सिर्फ शक्ल—सूरत से पहाड़ी होगी और अपनी बोलचाल व संस्कृति में उसका कुमाउनी संस्कृति से कोई लेना—देना नहीं रहेगा।

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