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मेरी प्यारी सी बिटिया, ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

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मनोज कुमार चतुर्वेदी की एक कविता — पिता की ओर से सभी बेटियों को समर्पित …..

मेरी प्यारी सी बिटिया
गुड़ की डलिया
सुंदर सी गुड़िया
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

मेरे साँसों की धड़कन
मेरी चिरंतन
मेरे सपनों की दुनिया
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

मेरे प्राणों से प्यारी
मेरे आन से न्यारी
मेरे जीवन का सौरभ
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

तारों की झिलमिल
सितारों की महफिल
मेरा तू गौरव
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

घर की तू हुलसी
आँगन की तुलसी
मेरी तू वैभवा
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

माँ की तू थाती
पिता की तू पाती
भाई की तू बहना
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

चाँद की चाँदनी
सूरज की रोशनी
रातों की रानी
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

पक्षियों में हंसा
सरोवर में मंसा
पर्वतों में रत्नागिरि
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

लौकिक – अलौकिक
देवी पारलौकिक
गाँव की सबला
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

धैर्य की पराकाष्ठा
सज्जनता की निष्ठा
अनाचार में ज्वाला
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

व्यंजन में छप्पन
मृत में अमृत
आँखों में ममता
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

तुम्हीं मेरी राजा
तुम्हीं मेरी रानी
तुम्हीं मेरी समिधा
तुम्हीं मेरी स्वाहा
तुम्हीं मेरी चितवन
तुम्हीं मेरी जीवन
तुम्हीं हो रवानी
तुम्हीं मेरी झरना
तुम्हीं मेरी पानी
तुम्हीं मेरी शुभता
तुम्हीं मेरी स्वास्तिक
तुम्हीं ब्रह्मनंद
तुम्हीं ओंकारा
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

तुम्हीं तो हो शक्ति
तुम्हीं तो हो भक्ति
तुम्हीं तो हो सीता
तुम्हीं तो हो गीता
तुम्हीं तो हो सरिता
तुम्हीं तो हो सागर
तुम्हीं तो हो राधा
तुम्हीं तो हो कृष्णा
तुम्हीं तो हो मीरा।

ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?
ढ़ूँढ़ू कहाँ मैं तुझे ?

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