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लघु कथा — खर्चा-पानी

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— पंकज शर्मा —
मनोज से मिलने उसका जिगरी दोस्त उसके आफिस में आया हुआ था।
‘‘यार, यह तू किस चक्कर में पफंसा हुआ है?’’ दोस्त ने पूछा।
‘‘क्यों क्या हुआ?’’ मनोज ने कहा।
दोस्त बोला, ‘‘मैं जब से यहां आया हूं देख रहा हूं कि तू अपने पास काम करवाने आने वाले हर व्यक्ति की किसी निर्माणाधीन मन्दिर की सौ-सौ, पचास-पचास रुपये की पर्चियां काट रहा है। कौन सा मन्दिर बन रहा है, यह जिसमें तेरी इतनी दिलचस्पी है कि तू इसके लिए इतनी सिरदर्दी ले रहा है ?’’
‘‘खर्चा-पानी? क्या मतलब ?’’
‘‘अरे यार, अब तुझसे क्या छुपाना, देख यह मन्दिर की पर्चियां मैंने यूं ही छपवा रखी हैं। अपने से काम करवाने वालों से थोड़े रुपये निकलवा लेता हूं। लोगों से वसूली करने में आसानी रहती है, वर्ना झंझट ज्यादा करना पड़ता है और लोग रिश्वतखोर कहते है सो अलग। इन पर्चियों के सहारे कुछ खुशी से तो कुछ मन मार कर रुपये दे ही जाते हैं और अपना खर्चा-पानी आराम से चलता रहता है’’, मनोज ने कहा।
‘‘और अगर पकड़े गए तो…..?’’ दोस्त ने फिर प्रश्न किया।
‘‘मतलब ही नहीं बनता, जिस मंदिर के नाम की यह पर्चियां है, वह यहां से बहुत दूर है, जल्दी से कोई जांच-पड़ताल नहीं कर सकता, इतना खर्चा और सिरदर्दी कोई क्यों मोल लेगा………और अगर चला भी गया तो भी कोई लपफड़ा नहीं। वहां के पुजारी को मैंने पटा रखा है। कभी-कभार उसको भी खर्चा-पानी पहुंचा देता हूं। आंखिर आती लक्ष्मी किसे बुरी लगती है….’’, कह कर मनोज जोर से हंस पड़ा।
-प्लाट नं.-19, सैनिक विहार सामने विकास पब्लिक स्कूल जण्डली, अम्बाला शहर, हरियाणा

अंबाला से लेखक पंकज शर्मा

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