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एक कहानी, आंखन देखी: किस्सा पिछड़े से विकसित बने गांव का !

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क गांव था। यहां के लोग बहुत संपन्न नही थे, लेकिन इतने लाचार भी नहीं कि अपने परिवार का भरण—पोषण न कर सकें। अधिकांश लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि और पशु पालन से जुड़ा हुआ था। गांव सड़क संपर्क मार्ग से कोसों दूर था। अतएव कोई अस्पताल, स्कूल नही थे। चिकित्सीय सुविधा का अभाव था। कई किमी दूर बीमार होने पर लोग जाया करते थे। जब किसी घर में कोई बीमार पड़ जाता तो जैसे पूरा गांव उसकी सेवा में लग जाता। दिन भर मरीज के घर हाल—चाल जानने वालों का तांता लगा रहता। यदि मरीज गंभीर हो जाता तो अपने कंधे पर ग्रामीण उसे कई किमी पैदल चलकर अस्पताल तक पहुंचाते। स्कूल भी दूर था। प्राइमरी की शिक्षा के लिए भी 2 किमी बच्चे पैदल जाते। आगे की शिक्षा के लिए पलायान भी एक मजबूरी थी। इसके बावजूद एक बात अच्छी थी कि सबका जीवन स्तर एक जैसा था। आय के जरिये लगभग एक समान ही थे। यही समानता उन्हें आपस में जोड़े हुई थी। इन ग्रामीणों में तो अधिकांश ऐसे थे, जिन्होंने कभी बस और ट्रेन तक नही देखी थी। बिजली यहां नही आई थी और लालटेन व अलाव जलाकर ग्रामीण प्रकाश की व्यवस्था करते थे। विकसित शहरों की नजर में यह एक पिछड़ा हुआ गांव था। भगौलिक दृष्टि से सड़क संपर्क मार्ग से दूर होने के कारण चुनाव के दौरान भी कोई नेताजी यहां नहीं पहुंचते थे, लेकिन वक्त बीतता गया। पूरे देश में विकास की बयार चली तो इनका राज्य भी विकास के पथ में आगे बढ़ चला। कई नयी योजनाएं आई। गांव सड़क संपर्क मार्ग से भी जुड़ गया। यहां बिजली भी आ गई। सड़क बनी तो स्कूल खुले, अस्पताल भी खुले। अब गांव वालों को जरूरी सुविधाओं के लिए दूर—दराज जाने की जरूरत नही रही। फिर यहां देखते ही देखते बाजार भी खुल गई। हर आवश्यकता और विलासिता की जरूरतें पूरी होने लगी। सुख—सुविधाओं के चलते रोजगार के नए द्वार खुले। अब यहां भी अमीरी आ गई। हां, लोगों के जीवन स्तर में भी अंतर हो गया। कोई कम कमा रहा था तो कोई अधिक कमाने लगा। फिर नेतागणों का भी यहां आना—जाना हो गया। विगत चुनाव में भाजपा और कांग्रेस की यहां सभा पहली बार हुई। चुनाव में यहां के ग्रामीणों ने जमकर हिस्सा लिया और अलग—अलग राष्ट्रीय दलों के बैनर, झंडे थाम लिये। अब समय बीत चुका है। यह एक विकसित गांव है। आदर्श गांव है। यहां अब सब कुछ है पर नही रहा तो आपस का प्रेम। भाजपा व कांग्रेस ने ऐसी आग लगा दी कि पड़ोसी भी आपस में बात करने को तैयार नहीं। यदि कोई बीमार पड़ जाता है तो पड़ोसी को पता ही नहीं चलता। पता चले भी सिर्फ एक बार हाल—चाल पूछ रस्म अदायगी कर लेता है। बच्चे काफी पढ़े लिखे हैं। अब बात—बात पर तर्क वितर्क करते हैं। खेती—बाड़ी खत्म हो चुकी है, पशु पालन में किसी की रूचि नहीं है। घर की औरतें सास—बहू के सीरियल देखने में व्यवस्त रहती हैं, आदमी टीवी चैनलों में राजनैतिक डिबेट के शौकीन हैं। जिनके घर के बाहर गाय—भैंस—बकरी बंधी रहती थी, वहां अब महंगी कारे हैं। गांव के बुजुर्ग अब पुरानी बातें याद किया करते हैं तो उनकी आंखे भर आती है। सब कुछ है, पर यह गांव अब गांव नही। बुजुर्ग कहते हैं काश यहां विकास नहीं हुआ होता, काश यह भाजपा—कांग्रेस के नेता हमारे गांव नही आते तो आज भी यह गांव—गांव ही रहता। इसका शहरीकरण नही होता और हमारा प्रेम खत्म नही होता। बुढ़ापा है बुजुर्ग सनक गये हैं। कहते हैं कि हमें नहीं चाहिये विकास हमें हमारा पुराना गांव लौटा दो नेताजी ! आप सत्ता का सुख भोगो, पर हमें हमारे हाल पर छोड़ दो।

— दीपक मनराल

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