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सीएनई विशेषः अनुभवों व उपलब्धियों के पिटारे की शान, प्रदेश में संभाली पुलिस मुखिया की कमान, उत्कृष्ट सेवा से वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अशोक कुमार ने चढ़े सफलता के पायदान

सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा
भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के 1989 बैच के अधिकारी अशोक कुमार अब उत्तराखंड पुलिस के 11वें पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) बन गए हैं। प्रदेश में पुलिस के नये मुखिया के रूप में उन्होंने कमान संभाल ली है। गौरतलब है कि प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अनिल कुमार रतूड़ी गत दिवस सेवानिवृत्त हो हुए हैं। उनकी सेवानिवृत्ति के बाद खासे अनुभवों व उपलब्धियों का पिटारे के साथ वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अशोक कुमार ने इस पद का कार्यभार संभाला है।
अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय से पदार्पण करते हुए आईपीएस अशोक कुमार ने उत्तर प्रदेश के जनपद इलाहाबाद से एएसपी के पद से सेवा का श्रीगणेश किया। उत्कृष्ट सेवा देते और उपलब्धियां जोड़ते हुए आईपीएस अधिकारी अशोक कुमार लगातार तीन दशक से सफलता के पायदान चढ़ते आ रहे हैं। बेहद मृदुभाषी, व्यवहार कुशल एवं अनुभवी अशोक कुमार उत्तर प्रदेश पुलिस, उत्तराखंड पुलिस समेत आईटीबीपी और बीएसएफ के महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन कर चुके हैं। अब तक के कार्यकाल में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अशोक कुमार इलाहाबाद, अलीगढ़, रुद्रपुर, चमोली, हरिद्वार, शाहजहांपुर, मैनपुरी, नैनीताल, रामपुर, मथुरा, पुलिस मुख्यालय देहरादून और गढ़वाल व कुमाऊं रेंज में विभिन्न पदों पर बखूबी कार्य कर चुके हैं। इसके अलावा वह सीआरपीएफ तथा बीएसएफ में प्रतिनियुक्ति पर रह चुके हैं। अपनी विशिष्ट कार्यशैली से उन्होंने हर जगह अपनी एक अलग पहचान बनाई। इस लंबे सेवा सफर से उनके अनुभव के पिटारे का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। विभाग में उनके समर्पण भाव का ही परिणाम है कि वह प्रदेश पुलिस मुखिया जैसे उच्च पद पर आसीन हुए हैं। अभी तक आईपीएस अशोक कुमार डीजी कानून व्यवस्था उत्तराखंड के पद पर कार्यरत रहे।
कुराना गांव से आप, हर जगह छोड़ी छापः हरियाणा राज्य के पानीपत जिले के छोटे से कुराना गांव में 20 नवंबर, 1964 को जन्मे अशोक कुमार ने प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल से प्राप्त की। उनका बचपन गांव में ही बीता। बाद में उन्होंने आईआईटी दिल्ली से बी.टेक और एमटेक किया। उनकी खूबी रही है कि वे पीड़ितों के पीड़ा हरने के भरसक प्रयास में रहते हैं। एक तरफ पुलिस के दायित्व और दूसरी ओर मानवीय पहलू। ये दोनों दायित्व एक साथ निभाने की खूबी कोई आसान कार्य नहीं है, लेकिन अशोक कुमार ने खाकी के साथ ये कार्य कर दिखाया है। उनका सदैव उनका प्रयास रहा है कि पुलिस व्यवस्था को बेहतर बनाकर गरीब व असहाय लोगों की जिन्दगी में बदलाव लाया जाए। यही वजह है उन्होंने हर जगह अपनी छाप छोड़ी है।
हालातों से निपटने की कला से लूटी वाहवाहीः वर्ष 2001 में कोसोवो में उत्कृष्ट कार्य के लिए पदक से सम्मानित हुए डीजीपी अशोक कुमार को वर्ष 2006 में दीर्घ एवं उत्कृष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति द्वारा पुलिस पदक से सम्मानित किया गया। ये सम्मान लंबी उपलब्धियों के फलस्वरूप मिले हैं। उनकी उपलब्धि पिटारे के कुछ अंश इस प्रकार हैं- (1) नब्बे के दशक में तराई में बढ़ते अपराधों को रोकने में उनकी भूमिका किसी से छिपी नहीं है। उनके नेतृत्व में शाहजहांपुर, रुद्रपुर, नैनीताल आदि जगहों पर कई बदमाशों के एनकाउंटर हुए और कई कुख्यात सलाकों के पीछे पहुंचे। (2) जब आईपीएस अधिकारी अशोक कुमार नैनीताल के एसपी देहात रहे, तब एक बार नैनीताल जनपद के एक गांव के पास गन्ने के खेत में कुछ बदमाश छिप गए। पता चलते ही आईपीएस अशोक कुमार ने मोर्चा संभाला और उनके नेतृत्व में करीब 3000 गोलियां चली और दो कुख्यातों को मौत के घाट उतारा गया। जिससे कुख्यातों के हौंसले पस्त हो गए। (3) वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन चरम पर था, तब आईपीएस अशोक कुमार एसपी चमोली थे। कई जगह राज्य आंदोलनकारी शहीद हुए, लेकिन अशोक कुमार ने ऐसे विवेक से काम लिया कि चमोली में एक भी आंदोलनकारी शहीद नहीं हुआ था और आंदोलन शांतिपूर्वक निपटा। (4) वर्ष 1995 में आईपीएस अशोक कुमार ने हरिद्वार में भव्य अर्धकुंभ का मेला भी शांतिपूर्ण निपटाने में सफलता प्राप्त की। इतना ही नहीं उनकी बेहतर कार्यशैली के अनेकानेक मिशालें हैं। उत्कृष्ट कार्यों के बदौलत उन्होंने कई बार वाहवाही लूटी है।
वर्दी में छुपा लेखक और लेखनी से निकला खाकी में इंसानः पुलिस सेवा और पीड़ितों की मदद में तो आईपीएस अशोक कुमार ने नाम कमाया ही है। एक और खासियत ये कि उनकी वर्दी के अंदर लेखक भी छुपा है। एकदम व्यस्तता के बावजूद वह लेखन के लिए वक्त निकालते हैं। उन्होंने कई विषयों पर आधारित पुस्तकें भी लिख डाली। इनमें उनकी ”खाकी में इंसान” नामक पुस्तक खासी प्रसिद्ध रही है। इसके अलावा चैलेंजेज टू इंटरनल सिक्यूरिटी नामक पुस्तक भी चर्चित रही है।

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