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प्रेस की आज़ादी

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संविधान के अनुच्छेद 19 ए(क) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। प्रेस की आजादी भी इसी में अंतर्निहित है। लोकतांत्रिक देश में मीडिया या प्रेस के आजादी सुनिश्चित ना हो तो लोकतंत्र भी ज्यादा समय के लिए कायम नही रह पाएगा। अंग्रेजो के समय भी प्रेस पर तरह तरह के प्रतिबंध लगाए गए और आजादी के बाद सन 1975 के आपातकाल में तो प्रेस का गला ही घोंट दिया गया,इसी का परिणाम रहा है इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गयी।
मीडिया को अपने नियंत्रण में करने के लिए देश और राज्य की सरकारें विज्ञापन के नाम पर अंधाधुंध पैसा खर्च कर समाचार पत्रों और मीडिया को अपनी ओर करती नजर आती है।मीडिया की आजादी को किसी न किसी तौर पर प्रभावित करने का काम किया जा रहा है फिर चाहे केंद्र या राज्य में किसी की भी सरकार क्यों न हो।
पत्रकार और पत्रकारिता आज अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत हैं।आये दिन पत्रकारों पर हमले और हत्या जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी देखने को मिलती है और निश्चित ही यह अभिव्यक्ति की आजादी और प्रेस की स्वतंत्रता पर बेड़ियां डालती है। प्रेस की आजादी के लिए काम करने वाली संस्था “रिपोटर्स विदआउट बॉर्डर्स” की वर्ष 2017 की रिपोर्ट बताती है कि “वर्ल्ड फ्रीडम इंडेक्स” में भारत 3 पायदान नीचे खिसककर 136 वे स्थान पर आ गया है। पिछले साल भारत मे 11 पत्रकारों की हत्या कर दी गयी और 46 पत्रकारों पर हमले की घटनाएं हुई साथ ही पुलिस कार्यवाही के मामले भी सामने आए। 5 सितम्बर 2016 को पत्रकार गोरी लंकेश की हत्या और उसी के 2 दिन बाद बिहार के अरवल जिले में राष्ट्रीय दैनिक अखबार के पत्रकार “पंकज मिश्रा” की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। 1990 के बाद आज वह समय है जब दुनिया भर में सबसे ज्यादा पत्रकारो को जेल भेज गया,उनपर हमले किते गए और उनकी हत्या तक कि गयी।अफगानिस्तान , सीरिया, फिलिस्तान ,बांग्लादेश जैसे देश तो पत्रकारों के खून से रंगे ही थे,अब यूरोपीय और अमेरिकी देश भी पत्रकारों के आगे सत्ता की तोप मुकाबिल कर रहे। किसी देश का लोकतंत्र कैसा है यह सरकार बनाम अखबार के रिश्ते से तय होता है। पिछले तीन दशकों से यह रिश्ता बहुत खराब होता जा रहा है। सरकारें अखबार को विपक्ष की तरह देख रही हैं और कुचल रही हैं।

आज नवउदारवादी नीतियों का शिकार अमेरिका भी है जहां बेरोजगारी और आर्थिक मंदी का संकट मुह ताके खड़ा है।अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा मीडिया को ही देश का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया गया।राष्ट्रपति के संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों को बेईज्जत किया गया।लेकिन यह एक सुखद पक्ष है कि दमन के बाद प्रेस ने अपनी आजादी की कीमत पहचानी।

आज म्यामां समेत पूरी दुनिया में प्रेस के लिए एक काला अध्याय है। क्याव सोओ और वा लोन पिछले साल दिसंबर में ही गिरफ्तार कर लिया गया। इनपर आरोप लगाया गया कि इन्होंने रोहिंग्या मामले में सरकार के गोपनीयता कानून का उल्लंघन किया। वहीं इन पत्रकारों का कहना है कि हमने रखाइन प्रान्त में मुसलमानों की हत्या का खुलासा किया।हमने वही लिखा जो हुआ। एक समय था जब म्यामां की नेता आंग सान सू म्यामां के मानवाधिकार की आवाज का विकल्प थी लेकिन आज प्रेस की आजादी के लिए उनकी आवाज बुलंद नही हो रही।

इससे पता चलता है पत्रकार और पत्रकारिता पर गहरे संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पत्रकारों के लिए अगर खतरा बढ़ता है तो इससे गंभीर मामलों में रेपोर्टिंग की गुणवत्ता और संख्या प्रभावित होगी। महत्वपूर्ण विषयों के पड़ताल में कमी आएगी।मीडिया का नजरिया एक तरफा या अति राष्ट्रवादी हो जाएगा जो मीडिया और लोकतंत्र के स्थायित्व के लिए गंभीर खतरा होगा

मीडिया या प्रेस में कई महत्वपूर्ण सुधारों की जरूरत है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को “ऐडवोकेट एक्ट” जैसा एक कानून बनाकर “बार काउंसिल ऑफ इंडिया” की तरह अधिकार सम्पन्न बनाना होगा जिससे पत्रकारों का दर्जा भी ऊंचा होगा। प्रेस कौंसिल का दायरा बढ़ाकर इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक ब्रॉडकास्ट और न्यू मीडिया समेत हर तरह के मीडिया को लाया जाना चाहिए। हमें मीडिया को व्यापक स्तर पर संरक्षण देना होगा वरना लोकतंत्र का एक स्तम्भ कमजोर हो जाएगा और लोकतंत्र भी तीन पैरों पर अधिक समय के लिए खड़ा नही रह पायेगा।इसके लिए जरूरी है कि पत्रकार और पत्रकारिता की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाए।

सुंदर बोरा

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