डा. राजेंद्र कुकसाल
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वर्षा काल में अमरूद के अधिकतर पके फलों में कीड़े दिखाई देते हैं साथ ही पेड़ से पके फल स्वत: गिरने लगते हैं। यह सब फलों पर फल मक्खी कीट के आक्रमण के कारण होता है। अमरूद के फलों में फल मक्खी का प्रकोप अन्य फलों की अपेक्षा अधिक होता है। वयस्क फल मक्खी लाल भूरे रंग की पंख पारदर्शक एवं चमकदार जिन पर पीले भूरे सुनहले रंग की धारियां होती हैं। फल मक्खी का आकार घरेलू मक्खी से कुछ बड़ा होता है।

मादा फल मक्खी जैसे ही फल पकने लगता है मुलायम फलों की त्वचा में छेद कर अन्दर फल के गूद्दे में अंडे देती है तथा छेद को मटमैले पदार्थ निकाल कर बन्द कर देती है। जिससे फल की त्वचा पर छोटे-छोटे बदरंग धब्बे पड़ जाते हैं। तीन से पांच दिनों बाद अण्डों से सूण्डियां/मैगेट निकल कर फलों के गूदे को खाना शुरू कर देती हैं। सूंडियों फल के गूदे को खाकर उसमें सड़न उत्पन्न कर देते हैं जिससे फल खाने योग्य नहीं रहते।


बीस से पच्चीस दिनों बाद ये सून्डियां फलों के डंठल के पास से छेद कर सुशुप्तावस्था में जाने के लिए ज़मीन पर गिरने लगती हैं जमीन में गिरते ही ये जमीन के अन्दर प्यूपा में रूपांतरित हो जाती है। डंठल के पास सूंडियों के छेद करने से डंठल का यह भाग कमजोर हो जाता है जिस कारण हल्की हवा चलने व हल्का सा पेड़ हिलते ही फल जमीन पर गिरने लगते हैं। प्यूपा एक सप्ताह बाद जमीन के अन्दर से वयस्क फल मक्खी बनकर वाहर निकलते हैं तथा अन्य स्वस्थ फलों पर आक्रमण करतें हैं।

फल मक्खी से फसल बचाव के उपाय :-

अमरूद की जाड़ों की फसल लें :

अमरूद में मुख्यत: दो फसलें वर्षात एवं जाड़ों में ली जाती है। फल मक्खी का प्रकोप वैसे तो वर्ष भर रहता है किन्तु वर्षा काल में वंश वृद्धि के लिए अधिक संख्या में निकलती है जिस कारण बरसात की फसल में फल मक्खी का प्रकोप अधिक होता है। वर्षा काल के फल निम्न गुणवत्ता वाले होते हैं जबकि जाड़े की फसल के फल उत्तम गुण वाले होते हैं तथा फलों में विटामिन–सी की मात्रा बरसात वाली फसल से अधिक पाई जाती है जिस कारण जाड़ों की फसल को बाज़ार में अच्छा मूल्य मिलता है। अत: फल मक्खी से बचने व अधिक आय के लिए अमरूद की जाड़ों की फसल लेनी चाहिए।

जाड़ों की फसल लेने के उपाय :

  1. फरवरी से जून तक पौधों को पानी नहीं देना चाहिये। पानी रोकने की यह क्रिया 4 वर्ष से अधिक उम्र के पौधों में ही करनी चाहिये जिससे बसंत ऋतु में आये फूल गिर जाते हैं तथा वर्षात में फूल काफी संख्या में आते हैं जिनसे जाड़ों में फसल प्राप्त होगी।
  2. एक या दो पेड़ होने की स्थिति में मार्च/अप्रैल/मई में आये फूलों को हाथ से हटायें।
  3. मार्च/अप्रैल माह में आये फूलों पर 10 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव करें जिससे बसंत ऋतु में आये फूल एवं पत्तियां झड़ जाती हैं तथा वर्षात जुलाई/अगस्त में फूल अधिक आते हैं जिनसे जाड़ों में फसल प्राप्त होगी।

फल मक्खी की रोक थाम :

  1. इस कीट के प्रकोप के प्रभाव को कम करने के लिए समस्त गिरे हुए तथा मक्खी के प्रकोप से ग्रसित फलौं को इकट्ठा कर गड्ढे में दबा कर नष्ट कर देना चाहिए।
  2. पौधों के आस पास घास इत्यादि है तो उसे अच्छी तरह से साफ करे। इसके बाद पौधों के चारों और उसकी परिधि की गोलाई में गहरी गुड़ाई करे। इससे यदि फल मक्खी या अन्य कीड़े के अंडे और प्यूपा होगें तो वे गहरे गुड़ाई में मर जाएंगे।
  3. फ्रुट फ्लाई ट्रेप – इस ट्रेप में ल्यूर ( गंदपास ) लगता है जिससे मक्खियां विशेष रूप से नर कीट इसकी ओर आकर्षित हो कर इसमें फंस जाते हैं नर कीटों की संख्या कम होने से इनकी वंश वृद्धि नहीं हो पाती।

कास्ट निर्मित योन गंध ट्रैप ( मिथाइल यूजिनाल ट्रेप )भी फल मक्खी कीट को नियंत्रण करने का एक प्रभावशाली तरीका है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एवं राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेषी परियोजना के द्वारा विकसित इस ट्रेप के लिए प्लाइवुड के 5x5x1 सेमी. आकार के गुटके को 48 घंटे तक 6:4:1के अनुपात में अल्कोहल, मिथाइल यूजिनाल, मैलाथियान के धोल में भिगो कर लगाते हैं। योन गंध ट्रेप की ओर फल मक्खी के नर कीट आकृषित होते है तथा कीटनाशक के सम्पर्क में आने से मर जाती है। कास्ट निर्मित योन गंध ट्रैप का निर्माण पानी की खाली बोतल ले कर भी स्वयंम कर सकते हैं।

ट्रैपों में दो माह के अंतराल पर ल्यूर (गंध पास ) को बदल देना चाहिए। दस पोधौ पर 2 ट्रेप का प्रयोग करें।

फल मक्खी ट्रेप /कास्ट निर्मित योन गंध ट्रैप , सम्बन्धित विभागों बीज दवा की दुकानों या AMAZON से भी औन लाइन प्राप्त कर सकते हैं।

  1. नीम आयल 3 मिली लीटर प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर फूल आने पर सात दिनों के अन्तराल पर तीन छिड़काव करें। दवा के घोल में सेम्पू,प्रिल या निरमा लिक्यड साबुन मिलाने पर अधिक प्रभावी हो जाता है।
  2. इस कीट के नियंत्रण के लिए विष चुग्गा का प्रयोग करें। एक लीटर पानी में 100 ग्राम चीनी या गुड व 10 मि. ली. मैलाथियान मिलाकर घोल तैयार करें ।इस घोल को डिस्पोजल कप में 50 से 100 मि.लि. भर कर पेड़ों पर लटका दें। फल मक्खी प्यास लगने पर गुड़ मिले पानी को पीने पर मर जाती है।
  3. परागण के बाद छोटे फलों को छेद किये पौलीथीन, मसलीन क्लाथ की थैलियां या किसी भी आवरण जिसमें हवा आ जा सके से कवर कर भी फल मक्खी कीट से बचाया जा सकता है।
  4. मैलाथियान 2 मि.लि. दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फल आने पर सात दिनों के अन्तराल पर तीन छिड़काव करें। दवा के घोल में 20 ग्राम देशी गुड़ प्रति लीटर की दर से अवश्य मिलाएं।

मोबाइल नंबर –
9456590999

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