AlmoraDharamUttarakhand

कैलै बांधी चीर हो रघुनंदन राजा… जागेश्वर धाम में चीर बंधन के साथ होली महोत्सव का भव्य शुभारंभ

जागेश्वर धाम में चीर बंधन
266views

जागेश्वर (अल्मोड़ा)/हरीश नाथू भटृ। सोमवार को जागेश्वर धाम में चीर बंधन के साथ ही होली महोत्सव का शुभारंभ किया किया। पूर्ण विधि विधान और रीति रिवाज के साथ होल्यारों और पुजारियों ने चीर बंधन कर होली गायन का क्रम शुरू किया। इस अवसर पर ‘कैलै बांधी हो चीर, हो सौ सीसी भर दे गुलाल, होली रै रसिया आज बृज में आदि कई होलियां होल्यारों ओर पंडितों पुजारियों द्वारा गाई गई। इस मौके पर सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार एकादशी पर्व के अवसर पर चीर बंधन कर होली का विधिवत आगाज किया गया। चीर को जागेश्वर मंदिर के अलावा हर एक दुकान और घरों में ले जाकर घुमाया गया। इस चीर के डोले का विधिवत पूजन किया गया। फाल्गुन माह की एकादशी से शुरू होने वाली होली गायन का यह क्रम जागेश्वर धाम सहित समूचे क्षेत्र में शुरू हो गया है। उल्लेखनीय है कि जागेश्वर धाम में चीर बंधन की भी अलग विशिष्ट परंपरा है। होलिकाष्टमी के दिन ही कुमाऊं में कही-कही मंदिरों में ‘चीर बंधन का प्रचलन है, पर जागेश्वर धाम में एकादशी को मुहूर्त देखकर चीर बंधन किया जाता है। इसके चलते रविवार को भी एकादशी का शुभ मुहूर्त देखते हुए जागेश्वर मंदिर के पुजारियों व क्षेत्र के नागरिकों द्वारा चीर बंधन किया गया। इसके लिए गांव के प्रत्येक घर से एक-एक नए कपड़े के रंग-बिरंगे टुकड़े ‘चीर के रूप में लंबे लठ्टे पर बांधे जाते हैं। इस अवसर पर कैलै बांधी चीर हो रघुनंदन राजा, सिद्धि को दाता गणपति बांधी चीर हो जैसी होलियां गाई जाती हैं। इस होली में गणपति के साथ सभी देवताओं के नाम लिऐ जाते हैं। इस अवसर पर जागेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति के प्रबंधक भगवान भटृ, मुख्य पुजारी हेमंत भटृ, ग्राम प्रधान हरीमोहन, नवीन भटृ, मुकेश, नाथू, गिरीश भटृ आदि सैंकड़ों ग्रामीण मोजोद थे।

कुमाऊं में ‘चीर हरण का भी है प्रचलन
जागेश्वर। गांव में चीर को दूसरे गांव वालों की पहुंच से बचाने के लिए दिन-रात पहरा दिया जाता है। चीर चोरी चले जाने पर अगली होली से गांव की चीर बांधने की परंपरा समाप्त हो जाती है। कुछ गांवों में चीर की जगह लाल रंग के झंडे ‘निशान का भी प्रचलन है, जो यहां की शादियों में प्रयोग होने वाले लाल सफेद ‘निशानों की तरह कुमाऊं में प्राचीन समय में रही राजशाही की निशानी माना जाता है। बताते हैं कि कुछ गांवों को तत्कालीन राजाओं से यह ‘निशान मिले हैं, वह ही परंपरागत रूप से होलियों में ‘निशान का प्रयोग करते हैं। सभी घरों में होली गायन के पश्चात घर के सबसे सयाने सदस्य से शुरू कर सबसे छोटे पुरुष सदस्य का नाम लेकर ‘घर के मालिक जीवें लाख सौ बरीस…हो हो होलक रे कह आशीष देने की भी यहां अनूठी परंपरा चली आयी है।

Leave a Response