नैनी सरोवर नष्ट होती धरोहर

—जी.एस. खाती

स्कन्द पुराण के मानस खण्ड के अनुसार नैनी झील का नाम त्रिऋषी सरोवर था। ऋषि अत्रि, पुलस्य व पुलाहा जब इस क्षेत्र में विचरण कर रहे थे तो उन्हें प्यास लगी, उन्होंने मानसरोवर का स्मरण किया और एक गड्डा खोदा। मानसरोवर का जल इसमें प्रवाहित हुआ। इस सरोवर के जल को मानसरोवर के जल के समान पवित्र माना गया है। कालान्तर में नैना देवी के नाम पर इसे नैना सरोवर कहा जाने लगा।


इस सरोवर का जल निर्मल व स्फटिक था। पर्वत के चारों ओर उगे वृक्ष व पर्वत शिखरों का प्रतिबिम्ब इसमें दिखाई पड़ता था। नैनीताल के खोजी बैरन सरोवर के नैसर्गिक सौन्दर्य को देखकर मंत्र मुग्ध हो गए थे। डाक्टर एम.एस. रान्धवा ने वर्ष 1939 में इसके विषय में लिखा ‘विशाल पर्वतों से सुरक्षित एक बहुत सुन्दर झील है। हवा में मस्ती से झूलते मजनू के वृक्ष एक शतत् शान्ति इस नगर को प्रदान करते हैं।’

यह झील 1838 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। इसकी लम्बाई 1466 मीटर चौड़ाई 466 मीटर अधिकतम गहराई 24 मीटर, औसत गहराई 18.55 मीटर तथा क्षेत्रफल 48.78 हेक्टेयर था। इसका जलग्रहण क्षेत्र 11.8 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है तथा 26 बड़े नालों द्वारा झील से जुड़ा है। झील में जलापूर्ति नल-श्रोतों, वर्षा व बर्फ से होती है। इसकी रचना की विशेषता है कि जो कुछ इसमें समाता है इसी में रह जाता है।

वर्ष 1875 में झील की क्षमता 31699 क्यूबिक मीटर थी, जो वर्ष 1979 में घट कर 26202 क्यूबिक मीटर रह गई थी। अब तो कचरे व मलवे के कारण इसकी क्षमता प्रतिवर्ष घटती ही जा रही है, बावजूद प्रतिवर्ष डेल्टों की सफाई में काफी धन खर्च करने के।

वर्ष 1955 से पूर्व झील का उपयोग नौकायन व तैराकी के लिए किया जाता था। झील से पीने के लिए पानी 1955 से पंप द्वारा दिया जाने लगा। स्थायी जनसंख्या व सैलानियों की संख्या में वृद्धि के कारण पेयजल की समस्या उत्पन्न हो गई थी। जिसके निराकरण के लिए एक नया पम्पिंग स्टेशन बनाया गया है तथा सूखाताल में एक टयूबवेल लगाया गया है। जल निगम द्वारा नगर की पानी की आवश्यकता 175 एल.पी.सी.डी. बताई गई है जबकि जल आपूर्ति 102 एल.पी.सी.डी ही हो पा रही है। 1995 से नई व्यवस्था चालू है।

वर्ष 1976 में हिल साइड सेफ्टी कमेटी के संस्तुति पर नगर पालिका के मार्ग पक्कीकरण के लिए लोक निर्माण विभाग को हस्तांतरित किए गए। एक बड़ी राशि इस कार्य के लिए स्वीकृत की गई। इसका उपयोग पैदल मार्गों को चौड़ा करने में किया गया। सारा मलवा सड़कों से नीचे ढकेल दिया गया और वर्षा ऋतु में यह झील में समा गया।

वर्ष 1979 में भवन निर्माण में लगे प्रतिबन्ध के हटने से भवन निर्माण की गति तेज हो गई। निर्माण जनित मलवे को वर्षा ऋतु में नालों में डाल देना इसके निस्तारण का सरलतम् उपाय था । मलवा हटाने के लिए प्रतिभूति नगरपालिका द्वारा जमा करवाई जाती थी-मलवा हटा या नहीं, इसकी चिंता नगर पालिका प्रशासन को नहीं थी। वर्ष 1977 से वर्ष 1989 तक नगर पालिका का प्रशासन सरकारी प्रशासकों के अधीन रहा।

नैनीताल व उसके आस-पास के क्षेत्रों के संतुलित, नियोजित एवं नियंत्रित विकास सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बृहत्तर नैनीताल विकास प्राधिकरण का गठन 26 अक्टूबर 1984 को हुआ। प्राधिकरण के गठन के साथ ही व्यवसायिक बिल्डरों व भू-माफिया कि घुसपैठ इस शहर व शहर के समीपी क्षेत्रों में शुरू हो गई। बड़े-बड़े व्यावसायिक निर्माण सुरक्षित व असुरक्षित क्षेत्रों में धड़ल्ले से आरम्भ हो गए और यह सिलसिला आज भी जारी है। निर्माण जनित मलवे के शहर से बाहर फेंके जाने का दायित्व प्राधिकरण का था। प्राधिकरण ने अपने दायित्व का निर्वहन कितनी निष्ठा से किया यह निर्माण स्थल पर फैले मलवे व प्रतिवर्ष झील में बनते ‘फैन्स’ व डेल्टों से उजागर हो जाता है। वर्ष 1987 से यह जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग को सौंपी गई है, वे क्या करते हैं देखना बाकी है।

विल्डर व प्राधिकरण की सांठगांठ व गाड़ियों की रेल-पेल ने दो बार टूट चुके टूटे पहाड़ को एक बार फिर टूटने को मजबूर कर दिया और 24-25 जुलाई 1998 को हजारों टन मलवा झील में समा गया। नगर में मल निकास का कार्य जल निगम/जल संस्थान द्वारा किया जाता है। नगर के कुछ क्षेत्र में मल निकासी के लिए सीवर ला विछाई गई है। नगर के अनेक भाग इस सुविधा से आज भी पचित हैं। सीवर लाइनों का रखरखाव की स्थिति अच्छी नहीं हैं। जगह-जगह छलकते सीवर व मल की दुर्गन्ध इसका प्रमाण हैं। यह मल नालियों के माध्यम से सरोवर में समा जाता है।

झील के जल ग्रहण क्षेत्र के अधिकांश भवनों की रसोई स्नान गृह व शौचालय का पानी सीवर लाइन से जुड़ा नहीं है। सड़कों पर जहां तहां वाहन खड़े रहते हैं और उनकी धुलाई भी वहां की जाती है। गंदा पानी, ग्रीज, मोबिल ओइल व अन्य गंदगी झील में पहुंचती है। जगह-जगह सड़कों व खुली जगह पर चाय चाट व सब्जी के खोमचे व फड़ नगर पालिका की उपविधियों की धज्जिया उड़ाते झील में गंदगी को बढ़ा रहे है। झील के किनारे बने रेस्टोरेट क्लब व धार्मिक स्थल व संस्थाऐं झील को प्रदूषित कर रहे हैं। झील में पहली नाव 1857 में डाली गई थी व पैडल बोट 1985 में आज 17 पाल नौकाऐं, 220 चम्पू नौकाऐं व 117 पैडल बोट झील को मथने में लगी हैं।

सार्वजनिक स्थलों, नजूल भूमि व असुरक्षित क्षेत्र में नित प्रति बढ़ते अतिक्रमणों व अवैध निर्माणों ने मल व मलवा निस्तारण की समस्या को और भी गम्भीर बना दिया है। जहां—तहां खोदकर अवैध निर्माण कर दिए जाते हैं। ना तो वो मलबा हटाने की राशि जमा करते हैं ना मल निस्तारण की अनिवार्यता उनके लिए है। बिजली व पानी के संयोजन उन्हें उदारता से मिल जाते है अवैध निर्माण ध्वस्त नहीं किए जा रहे हैं, न अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं फलस्वरूप अतिक्रमणों व अवैध निर्माणों की बाढ़ सी आ गई है। इनसे उपजा मैल व मलवा झील में समा रहा है।

उच्चतम न्यायालय के निर्देशों व सहाय समिति की संस्तुतियों के बाद भी, नगर पालिका ने घोड़ा स्टेंड हटाने लीद व कूड़े कचरे के निस्तारण के लिए कोई पहल नहीं की है। नगर में जन सुविधाओं का नितान्त अभाव। बढ़ती हुई आबादी, निर्माण कार्यों व अन्य व्यवसायों में लगे हजारों श्रमिक, खोखे-फड़ वाले शौच के लिए नालों, ढलानों व सरोवर के किनारे बैठते हैं। मल-मूत्र सरोवर में पहुंचता है। झील पर एक नज़र डालिए। पानी का रंग गहरा हरा, उसके ऊपर तैरती तैलीय पर्त। सरोवर की सतह को चीरती व मथती नावे व पैडल बोट इन पर बैठे हो-हल्ला मचाते न सैलानी, उनके द्वारा फैंकी गई प्लास्टिक बोतलें थैलियां पेय पदार्थों व स्नैक्स के तैरते खाली डब्बे। दिन प्रतिदिन बढ़ती लपलपाती पोटोमैगाटिनस-पेक्टीनस व अन्य सवाल। झील के जल में समाए विषैले जीवाणु, रसायन व खनिज झील में न गिरने वाले नालों के मुहानों पर मैल, मलुवा व पोलीथीन। आक्सीजन की कमी एवं पोलीथीन से मौसम-बेमौसम मरती मछलियां।

झील के पानी को अनेक विशेषज्ञों ने पीने के लिए अनुपयुक्त बताया है। पेट व आंत की बीमारियों से जूझता हुआ यहां का आम नागरिक ऐसा विषाक्त पानी पीने को विवश है। पैसे जल संस्थान का दावा है कि छलनियों से छना व दवा मिश्रित जल की आपूर्ति वे कर रहे हैं। यह तो झील के चेहरे का बयान है, इसके पेट में क्या समाया है, इसकी कल्पना से ही दिल दहल उठता है। ऐसी है दशा मानसरोवर के समान पवित्र झील की।
इस शहर और इस सरोवर को बचाने की पूरी जिम्मेदारी विकास प्राधिकरण, नगर पालिका, लोक निर्माण विभाग व जल-संस्थान की है और इनके कार्य कलापों के बीच समन्वय बनाने की जिम्मेदारी है आयुक्त/कुमाऊं मंडल की बर्बाद होते शहर व झील की बदहाली शहर के भाग्य विधाताओं की कार्य शैली को परिलक्षित करती है। झील की बदहाली पर एक रिट याचिका उच्च न्यायालय इलाहाबाद में दायर की। गई है, पर होगा क्या?

इस बीमार झील की संभावित मौत पर अनेक मंचों से चिन्ता व्यक्त की गई है। समितिया बनी हैं, प्रस्ताव व सुझाव भेजे गये हैं। भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना के अंतर्गत इसे जीवन दान देने की चर्चा है। जिला प्रशासन ने झीलों के संरक्षण के लिए चवालीस करोड सात लाख रूपये की योजना तैयार की है। पर लगता है न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। मरती झील को आक्सीजन देने का सुझाव भी आया है। यदि हम कटिबद्ध हैं, तो झील को बचाने के लिए तो काम चलाऊ व्यवस्था को त्यागना होगा। प्रदूषण व गाद के कारकों पर प्रभावी अंकुश लगाना होगा तथा युद्ध स्तर पर रक्षात्मक व सुधारात्मक उपाय करने होंगे। सरकारी विभागों, समाज सेवी संस्थाओं तथा समाज के सभी वर्गों को दृढ़ निश्चय, निष्ठा व पूर्ण समर्पण की भावना से अपना-अपना योगदान देना होगा।

डर है कि आखरी सांस लेती यह झील लाल फीताशाही के भंवर जाल में फंस, मैल व मलवे से पटकर दम न तोड़ दे। यदि ऐसा हुआ, तो कालान्तर में यह त्रिऋषि सरोवर पंच पापी पोखरों के नाम से जाना जायेगा। इस भुतहे शहर में फिर आयेगा कौन?

साभार— कत्यूरी मानसरोवर, वर्ष—4, अंक—1 व 2 (संयुक्तांक)

नोट — उक्त आलेख कई वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ था, जिसमें झील के तत्कालीन हालातों का वर्णन है। तब से वर्तमान तक काफी कुछ परिवर्तन भी हो चुके हैं।

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