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गाँव के लिए समर्पित कविता — ‘चलो दीप जलाएं गांवों की’

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मनोज कुमार चतुर्वेदी द्वारा रचित कविता —

चलो दीप जलाएं गांवों की
चलो प्यास बुझाएं गांवों की
माटी के दियों में
भर स्नेह जलाएं गांवों की
चलो ज्योति जलाएं गांवों की
चलो दीप जलाएं गांवों की

गुलीडंडा, कबड्डी, कंचा, चिक्का
चलो अलख जगाएं गांवों की
मिट्टी से सोना बरसाएं
धरती सरसाएं गांवों की
आम्र मँजरी, महुआ कूँचा
कोयल पिक हैं गांवों की
भूखमरी, जर्जर काया, अधोवस्त्र
उपेक्षित जीवन, टूटी झोपड़ियाँ
चलो भूख मिटाएं गांवों की
चलो ज्योति जलाएं गांवों की
चलो दीप जलाएं गांवों की

शहरों से हट-हटकर आगे
मजदूर-मिल हो गांवों की
गांव ही नगर बन जाएं
आनंद मनाएं गांवों की
दिव्य अलौकिक, शक्ति स्रोत
महिमामंडित गांवों की
राम, रहीम, सूर, रसखान,
कविरा, मीरा गांवों की
मनई, सनई, अलगू चौधरी
उपन्यासों की भाषा गांवों की
चलो ज्योति जलाएं गांवों की
चलो दीप जलाएं गांवों की

उर्बर धरती खलिहानों में
कहीं गाय रँभाती गांवों की
धरती ने ली अँगड़ाई
चलो धूल लगाए गांवों की
लिट्टी – चोखा, बैगन भर्ता
याद दिलाएं गाँवों की
सतुई, आँचार, टिकोढ़ा, चटनी
मकई, भुट्टा, ज्वार-बाजरा
होरहा, छाँछ, दूध और मट्ठा
स्वाद बढ़ाएं गावों की
चलो ज्योति जलाएं गांवों की
चलो दीप जलाएं गांवों की

वीर रस नगाड़े बजते
अखाड़ें सुरभित गांवों की
संस्कृति-कला का अद्भुत संगम
हर्षित धरती गांवों की
धर्मों ने सब प्रेम निभाया
अमृत धरती गांवों की
नाना—नानी, दादा-दादी
बाबा-ईआ, मक्खन-मिसरी
अपनी धरती गावों की
अपनी धरती गांवों की
चलो ज्योति जलाएं गांवों की
चलो दीप जलाएं गांवों की
चलो दीप जलाएं गांवों की

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