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पढ़िये क्या है होली के मायने और इतिहास : धार्मिक महत्व और ऋतु परिवर्तन का परिचायक, जीवन में रंग भर देता है होली का पर्व

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डाॅ. ललित चंद्र जोशी ‘योगी’पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, एसएसजे परिसर, अल्मोड़ा

फागुन की घड़ियां आई हैं। हर तरफ रंगों की बहार है। रंगों की बौछार हो भी क्यों ना ? आंखिर लाल, गुलाल, हरे रंगों का त्योहार जो हुआ। हिंदू धर्म में यह त्योहार काफी मायने रखता है। बिन रंग के इस मास की कल्पना नहीं की जा सकती। बिन रंग के हिंदू समाज की बात फीकी-फीकी सी लगती है। होली को खुशी मनाने, नाचने-गाने का त्योहार माना गया है। सभी लोग रंगों में रंग कर बैर भाव मिटाकर मिलते हैं। इस त्योहार में हिंदू मुसलमान के बीच का फर्क नहीं होता, बल्कि दोनों में यदि रंग होता है तो वह है अबीर, गुलाल का। कुमाऊँ की थात है होली। होली कुमाऊँ का मनाया जाने वाला पर्व है। जिसको यहां फाग के रूप में भी जाना जाता है। ‘काठक गृह्य सूत्र’ के एक सूत्र की व्याख्या में टीकाकार देवपाल ने होली के पर्व को एक विशेष कर्म कहा है। इसका उल्लेख ‘कामसूत्र’ में तथा जैमिनि के अनुसार भी इस पर्व का आरम्भिक शब्द ‘होलाका’ था। जैमिनि तथा ‘काठक गृह्य सूत्र’ में भी इस पर्व का उल्लेख होने से स्पष्ट होता है कि होली का पर्व ईसा की कई शताब्दियों पूर्व से प्रचलित था। ‘कामसूत्र’ एवं ‘भविष्योत्तर पुराण’ इस पर्व को बसन्त ऋतु से सम्बद्ध करते हैं। पूर्णिमान्त गणना के अनुसार यह उत्सव वर्ष के अन्त में होता था। वहीं परम्परा अभी चली आ रही है। इस उत्सव के अवसर पर उमंग भरे गीत, नृत्य और संगीत बसन्त आगमन के उल्लासपूर्ण क्षणों के परिचायक हैं। होली का पर्व वस्तुतः हर्ष, उल्लास और ऋतु परिवर्तन का ही पर्व है, जो सम्पूर्ण देश में मनाया जाता है। वात्स्यायन ने भी अपने ग्रंथों में कई जगह ‘मदनोत्सव’ का उल्लेख किया है। हमारे भारतीय साहित्य में वैदिक युग से ही उत्सवों के उल्लेख उपलब्ध होते हैं तथा इनसे विदित होता है कि स्त्रियां पर्वों तथा उत्सवों में पुरूषों के साथ मनोविनोद करती हैं। वैदिक वाड़मय से ज्ञात होता है कि उस समय स्त्रियों की दशा बहुत उच्छी थी तथा वे पर्वों एवं उत्सवों में खुलकर भाग लेती थीं। कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् बसन्तोत्सव, जिसे मदनोत्सव भी कहा गया है, आदि कई उत्सवों को मनाया बताया गया है। इसके अलावा होली का रामायण से लेकर महाभारत और पुराणों में भी देवोत्सव, महोत्सव, वृक्षोत्सव, बसन्तोत्सव, मदनोत्सव, जलोत्सव इत्यादि अनेक उत्सवों का उल्लेख मिलता है। जिसमें स्त्रियां इस उत्सव को हर्षोल्लास से मनाई हुई दिखलाई पड़ती हैं। वैसे तो सारे उत्सवों में महिलाओं की भूमिका गौंण होती है, लेकिन होलिकोत्सव में तो स्त्रियों की विशेष भूमिका होती है। वे बसन्त के आगमन पर उमंग भरे गाने, नृत्य और संगीत के साथ मनोविनोद करती हैं। बसन्तोत्सव में स्त्रियों के मनोविनोदों का वास्तविक चित्रण कालिदास तथा वात्स्यायन के ग्रंथों में भी प्राप्त होता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में ‘बसन्तोत्सव’ को ‘मदनोत्सव’ का नाम भी भी दिया गया है। ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम’ के अनुसार मदनोत्सव माघ शुक्लपक्ष की पंचमी को मनाया जाता था। इसमें नृत्य गीतों को प्रधानता दी जाती थी तथा अबीर-गुलाल खेला जाता था। ‘कामसूत्र’ की जयमंगलटीका ‘सुवसन्तो मदनोत्सवः तत्र नृत्य गीत वाद्य प्रायः क्रीड़ा’ के अनुसार इस मदनोत्सव को सुवसन्तक भी कहा गया है और इसे नृत्य गीत वाद्य प्रधान उत्सव माना गया है। प्राचीन काव्य ग्रन्थों, आख्यायिकाओं और नाटकों में भी ऋतु सम्बन्धी उत्सव मनाये जाने का उल्लेख मिलता है। इनमें बसन्तोत्सव को प्रमुख उत्सव माना गया है। वसान्तोत्सव के अन्तर्गत भी सुवसान्तक और मदनोत्सव ये दो प्रकार के उत्सवों को मनाये जाने का उल्लेख मिलता है। वास्यायन के अनुसार इन उत्सवों को लोग एकत्र होकर मनाते थे। मदनोत्सव का उल्लेख ‘मत्स्य पुराण’ में भी मिलता है, जिसके अनुसार वासुदेव कृष्ण की सोलह हजार स्त्रियों द्वारा बसन्त ऋतु में मदनोत्सव मनाया जाता था। वे सज-धज कर पान गोष्ठियों में भाग लेती थीं। ‘कुट्टनीमतम्’ के अनुसार मदनोत्सव पर रसिक व युवा गृहणियां ताली पीटती हुई नृत्य गीतों में भाग लेती थीं और मद मस्त होकर कभी कभी अभद्र भाषा का भी प्रयोग करती थीं। ‘कामसूत्र’ में होलिकोत्सव को ‘उदकक्ष्वेदिका’ या जल फेंकने की क्रिया नाम से पुकारा गया है। इसमें सभी स्त्री-पुरुष एक दूसरे पर जल फेंककर उत्सव मनाते थे। यह उत्सव फाल्गुन की पूर्णिमा को मनाया जात था। इस उत्सव में युवक और युवतियां एक दूसरे पर कीचड़ भी उछालते थे। देव-भाभी का हास-परिहास चलता था और आम्र की नई लताएं तानकर विनम्र मार-पीट भी चलती है। कुमाऊँ में वैसे तो होली के पर्व को बडे़ ही समरसता के माहौल में मनाया जाता है, लेकिन फिर भी उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में होली की बात कुछ और ही है। अल्मोड़ा नगरी के हर गली, मोहल्लों में होली की बयार फाग ऋतु में बह जाती है। यहां के हुक्का क्लब अल्मोड़ा में गाये जाने वाली होली की तो बात ही कुछ और है। होली गायकों कंठ से निकलती हुई सुरीली ध्वनि और तबले, मंजीरे की संगत ने हुक्का क्लब साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्था में कुमाऊँनी संस्कृति की बयार बहती है। इस बैठकी होली की खास बात है कि इस बैठकी होली में नगर भर के होली गायक शिरकत करते हैं। वैसे होली लोक संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। बैठकी होली शाम के वक्त घर के भीतर और खड़ी होली सुबह के समय पुरूष और महिलाएं घेरा बनाकर नृत्य करते हुए सार्वजनिक स्थलों का भ्रमण करते हैं। यहां होने वाली बैठकी होली में इन निम्न गितों का उद्बोधन होता है- कन्हैया पर आधारित गीतों में ‘ऐसे रंग ढंग कैसे, मचेगी लाज मोरी। कुंवर कन्हैया, काहूं की, ऐसे लड़त मानो’, ‘रग सारी गुलाबी चुनरिया, मोहे मारे नजरिया सवरिया। जाओ री जाओ करो नाहीं बतिया, अभी बाली है मोरी उमरिया। ऐसो ढ़ीठ लंगर नटखट संग को, कब आवेंगे मोरे सावरिया।’, ‘मोरी भीज गयी तन सारी रे, न मारो मोहन पिचकारी। बेदर्दी मोरी कहूं न माने, अंगिया चुनर रंग ही न माने।’ ‘चरनन लगन लगाओ, सगरे भाग जगाओ। जब तप तीरथ, मोहे ध्यान नचाहे।’ ‘‘नथुली में उलझेंगे बाल, सिपहिया काहे जुल्फें बढ़ाये। ये नथुली पांच मोहर की, सैंया गढ़ाय।खींच खाचे मोरी नथुली बिगाड़ी, मुखट की हाल, सिपहिया देखोरी।‘ मैं तो भूल से देखन लागी रे, उधर सारी डार गयो मो पे रंग। रंग की गागर सारी, कान्हा डार गयो मो पे रंग।।’ ‘सिद्धि को दाता विघ्नविनाशन, होली खेलें गिरिजापति नंदन, शिव शंकर खेलत हैं होली, अंबा के भवन में बिराजे होरी, आज अयोध्या में भई बधाई, शिव मठ पर सोहे लाल ध्वजा, देवी का थान पतरिया नाचे। कान्हा ब्रज को बसैया कान्हा, गड़वा भरन नाहीं देत। महिला बैठकी होली में ‘ब्रज मण्डल देश दिखाओ रसिया’, ‘मथुरा में खेले एक घड़ी’, ‘जै बोलो यशोदा नंदन की’, ‘बलमा घर आये फागुन में…’, आदि गीत गाये जाते हैं। होली के बाद छलड़ी होती है जिसमें घर घर जाकर आशीष दी जाती है। सभी लोग परिवार का नाम लेकर कहते हैं-आज का बसन्त कैका घरा, उनर पूत परिवार, जीवो लाख सौ बरिसा। बरस दिवाली बरसै जाग, जो नर जीवे खेले फाग, हो हो होलक रे…।’ इसके अलावा खड़ी होली भी यहां मनाई जाती है। होली गायन में शिव, कृष्ण, राधा, प्रेयसी, प्रेमिका आदि का नामोल्लेख होता है। होली में राग काफी, मल्हार, जैजवंती, फाग आदि रागों पर आधारित गीतों का गायन भी किया जाता है। यहां की बैठकी होली की खास बात यह है कि पूस के प्रथम सप्ताह से फाल्गुन तक होली का गायन होता है। इसमें बाल होली गायक भी बडे़ गायकों के साथ गायकी करते हैं। होली का पर्व प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है। होली का वैभव यहां के लिए ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। महाभारत काल की रचनाओं, पुराण, ग्रंथों, आदि लेखों में विद्याधर, अप्सरा, यक्ष, किन्नर और कालिदास की कृतियों में किरातों, रघु की दिग्विजया में हूणों, उस्मान की चित्रावली में खसों का उल्लेख हुआ है। यहां के लोक साहित्य में प्रमुख रूप से प्रकृति पूजा, यक्षपूजा, नागपूजा, देवपूजा, भूमिपूजा इत्यादि के उल्लेख और अवशेष मिलते हैं। हमारे कुमाऊँ में होली के गीतों का गायन विशेष रूप से बसन्त पंचमी के दिन से ही शुरू हो जाता है। विषयवस्तु की दृष्टि से यहां भक्तिप्रधान, श्रृंगार प्रधान और प्रसंगप्रधान होलियां जाती हैं। भक्ति प्रधान गीत यहां के मंदिरों और घरों में बसन्त पंचमी से ही गाये जाते हैं। यह परम्परा अब कम हो गई है लेकिन फिर भी बडे़, बूढे़, बुजुर्गों, गीतकारों, महिलाओं, रसिक जनों और कई संस्थाओं के इस परम्परा को अभी जीवित रखा है। गावों के मंदिरों और चबूतरों में रात-रात भीर धूनी जलाकर ढ़ोलक और नगाड़ों के साथ अभी भी देवताओं के गीत कई जगह सुनाई पड़ते हैं। नई पीढ़ी में अब इन स्तुतिपरक गीतों से मोहभंग होता जा रहा है। श्रृृंगार प्रधान होली के गीतों में उन्मुक्त हास-परिहास भी परिलक्षित होता है। इन गीतों में कई जगह अश्लीलता का भी प्रयोग हुआ है। प्रसंग प्रधान गीतों में राधा, कृष्ण, राम-सीता, शिव-पार्वती, लक्ष्मण, गणेश, मथुरा, अवध इत्यादि प्रसंगों की होलियां गाई जाती हैं। इनके अलावा पति-पत्नी, देवर-भाभी के पारस्परिक प्रेम, फेलों का खिलना, लाख वर्ष तक जीवित रहने की कामना वाले होती के गीतों बसनतोत्सव या होलिकोत्सव के अनुरूप प्रासंगिकता मिलती है। ये हमारी लोकपरंपरा और लोक साहित्य की अमूल्य निधि हैं। रंगकर्मी त्रिभुवन गिरि का कहना है कि पारंपरिक होली को यदि कहीं देखना है तो हुक्का क्लब की होली का रूख किया जाये। आज देश भर में कई शोधार्थी यहां की होली पर शोध कर रहे हैं, जिसके लिए वह यहां की होली से अपना शोध प्रबंध तैयार करते हैं। रंगकर्मी राजेन्द्र तिवारी का कहना है कि यहां की होली गायन आज शराब की भेंट चढ़ रहा है, जिन कलाकारों को सरस्वती का वरदान था आज वह मद्यपान से ग्रस्त हैं। कारण यह है कि संस्कृतिकर्मियों की आर्थिक स्थिति तंग होना। होली में श्रृंगार-सौंदर्य, हास, वियोग, यौन संबंध आदि को उजागर करने वाला, वैराग्य की स्थिति को दर्शाने वाला, पे्रम में डूबने वाला वर्णन आता है। होली में सामूहिकता के दर्शन होते हैं। आज होली ने कई तरह के परिवर्तन देखे हैं। अब होली में रंग तो दिखता है पर वह रंग अबीर-गुलाल का नहीं, बल्कि शराब का दिखता है। शराब की वजह से होली का रंग फीका सा लगता है। आधुनिकता, बाजारवाद, फूहड़ता आदि सभी इन होलियों में दिखने लगा है। संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति की छाप पड़ने लगी है, लेकिन अभी होली जहां भी बची है, वहां होली सहेजने लायक होती है। होली हमारे समाज को प्रकट करती है, हमारे समाज के दुःख-सुख को प्रकट करती है। वह जीवन में रसों को घोलने का काम करती है।हमारे होली गीत हमारे परिवेश, हमारे समाज, हमारे पर्यावरण, हमारे अंचलों से जुड़े हुए होते हैं।तरह-तरह के प्रसंग इन गीतों में आते हैं। श्रंगारिक विषय हो या फिर वियोग, ये सभी हमारे इन गीतों में आते हैं। हमारे गीतों में कई तरह के प्रसंग आते हैं, जिनको सुनकर हृदय में रंगों की पिचकारी छिड़कने लगती है। मैं विस्तार से चर्चा न कर कुछ बिंदुओं पर सिमट कर ही चर्चा करता हूं- प्रियतम अपनी प्रियतमा को जब चुपके से उठाने के लिए शैतानी करता है तो प्रियतमा इस तरह कहती है- ‘प्यारा चित चोर, हमारा पियारा चितचोर/ सोई थी मैं अपने महल में, आयी नींद अपारा/ प्यारा चित चोर, उषा कन्या ने सपने में/ देखा अपना प्राण, पियारा चित चोर…।’ प्रियतमा अपने प्रिय को हृदय को चोरी करने वाला संबोधित कर उसके द्वारा की गयी छेड़ाखानी तथा उसे अपने सपने में देखने को इस गीत में कहती है। चूंकि रंगों का उत्सव जिस मास में आता है, उस मास से ही भौरों का गुंजन प्रारम्भ होता है। हमारे ऋतु भी अलग-अलग तरह से बंटे हुए हैं। अलग-अलग ऋतुओं के अलग-अलग मास, अलग-अलग पहचान भी है। कृष्ण और राधा के बीच होने वाले प्रेम संचार, हास-परिहार, छेड़खानी, शैतानी आदि को लेकर होली के गीत गाये जाते हैं। साथ ही होली के गीतों में भंवरे, ऋतुओं का वर्णन भी आता है। एक गीत में वर्णन इस प्रकार हुआ है-‘खेलत गोपी ग्वाल लाल रे मथुरा से होली आई। चैत मास सरसों फूले हो चैत मास सरसों फूले। भंवरा देह गुंजार लाल रे मथुरा से होली आई। बैसाखे गुलाब खिले हो बैसाखे गुलाब खिले।‘ इस गीत में प्रत्येक मास में जो जो भी पुष्प खिलते हैं, उन सबका वर्णन हुआ है। हर मास की अपनी-अपनी खास बात होती है। इस गीत में भी उन खास बातों को पिरोया गया है। प्रियतमा का अपने परदेश गये प्रियतम की याद जब रंगीली होली में सताने लग जाती है, तो उस समय प्रियतमा के हृदय में अपने प्रिय से बिछुड़ने की पीड़ गहराने लगती है। उसका कलेजा प्रियतम की याद में जब फटने लग जाता है, जब यह पीड़ा असहनीय होने लगती है, तो वह काग पक्षी से अपने प्रिय की खबर लाने के लिए अनुरोध करती हुई दिखाई पड़ती है। वह काग पक्षी को संबोधित करते हुए विरहन, निरभाग, पांव पड़कर उससे पिया की खबर लाने के लिए अनुनय विनय करती है। हमारे गीतों में पक्षियों को संचार माध्यम के रूप से प्रस्तुत किया जाता रहा है। कौव्वा हो या कबूतर, ये सभी पक्षी किसी न किसी रूप में संचार के माध्यम के रूप में आये हैं। एक होली गीत में इस तरह भी आया है-हां रे कागा पिया की खबर मोह ला दीजो। उत ला दीजो तत्काल, कागा पिया की खबर। मोहे ला दीजो हां रे कागा चूंच बना दूंगी सोने की। उत पांव हीरा झलकाय, कागा पिया की खबर, मोहे ला दीजो हां रे कागा पंख बना दूंगी रूपै का….। गीत में प्रियतमा कौव्वे को कहती है कि पिया की खबर ला दो, तो मैं तुम्हारी चोंच को सोने का, पंख रुपये का, गले में मोतियों की हार बना दूंगी। गोपियां कन्हैया से कुंजन की गलियों में ले जाने का आग्रह करती हुई गीतों में दिखाई पड़ती हैं। इस तरह होली का अपना ही मजा है। यह उत्साह से भर देने वाला पर्व है। हम सभी को अपने मन से नकारात्मक भाव त्यागकर होली के रंग में बह जाने की जहमत उठानी ही चाहिए।

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