-जयंती पर विशेष आलेख-


अल्मोड़ाः
जिले के अनमोल व्यक्तित्व, जिनके नाम से सोबन सिंह जीना परिसर अल्मोड़ा व सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा है, उनका जन्म ग्राम सुनौली, स्यूनरा, जिला-अल्मोड़ा में 04 अगस्त 1909 को प्रेम सिंह जीना व कुन्ती देवी के घर में हुआ। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा बसौली से हुई। इसके पश्चात उन्होंने जीआईसी नैनीताल से हाईस्कूल व जीआईसी अल्मोड़ा से इण्टरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए व एलएलबी की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। वे पढ़ने में बड़े ही प्रखर थे। हर परीक्षा को प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर कई छात्रवृत्तियां प्राप्त की। सन् 1933 में उन्होंने वकालत प्रारम्भ की तथा एक लोकप्रिय व सफल अधिवक्ता के रुप में विख्यात हो गये।

स्व. सोबन सिंह जीना एक प्रबुद्ध अधिवक्ता के साथ-साथ कर्मठ समाज सेवक भी थे। वे अल्मोड़ा जिला परिषद के सदस्य भी चुने गये तथा जिला परिषद शिक्षा कमेटी के चेयरमैन भी निर्वाचित हुए। इस दौरान वे ग्रामीण जनता तथा वहां कार्यरत अध्यापकों से मिले तथा यहां के जीवन व वास्तविक कठिनाईयों से रूबरु हुए। वे अल्मोड़ा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष जीवन पर्यन्त रहे। वे जनसंघ से प्रभावित सोबन सिंह जीना ने जनसंघ की ओर से लोकसभा व विधानसभा के कई चुनाव लड़े। वे समाज में व्याप्त रूढ़िवादी प्रवृत्तियों के भी कठोर विरोधी थे तथा समाज में शैक्षिक उन्नति के समर्थक थे। उन्होंने ‘कुमाऊं राजपूत परिषद’ नामक संस्था के माध्यम से सुधार लाने में सक्रिय भूमिका निभाई। बिट्रिश सरकार ने उन्हें ‘राय बहादुर‘ की पदवी से अलंकृत किया गया, लेकिन जीना जी ने इसे कभी भी प्रतिष्ठासूचक या सम्मानजनक नहीं समझा। उन्होंने शिक्षण संस्थानों के संरक्षण व सहायता करके निर्धन विद्यार्थियों की मदद की।


नारायणस्वामी इण्टर कॉलेज पिथौरागढ़, बाड़ेछीना इण्टर कॉलेज, अल्मोड़ा इण्टर कॉलेज व अल्मोड़ा महाविद्यालय के संस्थापक व व्यवस्थापक रहे। सन् 1977 में जीना जी अल्मोड़ा बारामण्डल से यूपी विधानसभा के लिए विधायक चुने गये और उन्हें पर्वतीय विकास मंत्री बनाया गया। इस कार्यकाल में जीना जी ने पर्वतीय क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने बजट को उस क्षेत्र के विधायक को देने की शुरूआत की। वे कहते थे कि अपने क्षेत्र की आवश्यकता व समस्या को उस क्षेत्र का विधायक बेहतर तरीके से जानता है। अतः वे सभी को बराबर बजट बांट देते थे। मंत्री पद पर रहते हुए भी वे मितव्ययी थे तथा सरकारी गाड़ी व टेलीफोन का दुरूपयोग नहीं किया। विधानसभा की बैठकों में उनको मितव्ययता की भूरि भूरि प्रशंसा की गयी। पहाड़ के क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों के लिए पर्वतीय भत्ता सिद्धान्त के अनुसार देने की माँग तत्कालीन मुख्यमंत्री के सम्मुख रखी, जिसे स्वीकार किया गया। सोबन सिंह जीना कुमाऊं के उन महान नेताओं में थे, जिन्होंने अपना जीवन राजनीति के साथ-साथ व ग्रामीण जनता के सुख-दुख व उनके अधिकारों की रक्षा को समर्पित किया।

उन्होने ‘पताका’ नामक साहित्यिक समाचार पत्र का प्रकाशन किया था। जिससे वे हिमालय के आर्थिक व सामाजिक पक्षों को उजागर करने वाले लेख लिखते थे। उन्होंने अपने लेखों में यह विचार व्यक्ति किया कि मैदान के जिलों के लिए तैयार की जाने वाली योजनाओं को पहाड़ पर जस का तस लागू नहीं किया जा सकता है। पहाड़ के लिए बनने वाली योजनाओं में वहां के स्थानीय व्यक्तियों की राय भी अवश्य शामिल की जानी चाहिए। वे शैक्षिक उन्नति को ही सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का साधन मानते थे। वे शैक्षिक पिछड़ेपन को एक अभिशाप मानते थे। अतः शैक्षिक प्रगति के लिए वे जीवनपर्यन्त कार्य करते रहे। इस तरह जीना जी एक कुशल प्रशासक, कानूनविद व समाजसेवक थे। उन्होंने समाज व वंचित वर्ग के लिए भी बहुत कार्य किये। सन् 1968 में इनकी पत्नी का निधन हो गया। इसके बाद वह अकेले रह गये। 02 अक्टूबर 1989 को जीना जी यह संसार त्याग कर चले गये। उनके शिक्षा के प्रति समर्पण को देखते हुए अल्मोड़ा कैम्पस का नाम शोबन सिंह जीना परिसर रखा गया है। आज उनकी 113वीं जयंतती मनाई जा रही है, ऐसे महान व्यक्तित्व को नमन्।

  • आलेख-डॉ. ललित जलाल, सहायक अध्यापक

राजकीय आदर्श इंटर कालेज अल्मोड़ा

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