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‘बसंत’ पर रचनाकार भुवन बिष्ट की दो कविताएं

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भुवन बिष्ट — मौना, रानीखेत, उत्तराखंड

जय जय वीणावादनी।
जय वीणा की झंकार।।
पीताबंर ओढ़े है धरती।
आयी है बसंत बहार।। …..
सद्बुद्धि सदमार्ग मिले।
कृपा मातेश्वरी तुम्हारी।।
ज्ञान का मन में हो संचार।
मिटे अशिक्षा अत्याचार।।
राग द्वेष से मुक्त हो जग।
बहे प्यार खुशियों की धार।।
पीताबंर ओढ़े है धरती।
आयी है बसंत बहार।। …..
जय जय वीणावादनी।
जय वीणा की झंकार।।
ज्ञान कला संगीत की।
माता भरती हो भंडार।।
खेत खलिहानों ने भी ओढ़ी।
नयनाभिराम हैं पुष्प सुगंधित।।
रंग बिरंगी धरा पिताबंरी।
मन में भी जागे संचार।।
पीताबंर ओढ़े है धरती।
आयी है बसंत बहार।। …..
सुख दुःख का यह ज्ञान कराता।
पतझड़ बित बसंत आ जाता।।
ज्ञान के चक्षु खुल जायें।
मानव मानवता दिखलायें।।
मानव के हृदय में जगा दे।
सद्गुण साहस सुविचार।।
पीताबंर ओढ़े है धरती।
आयी है बसंत बहार।। …..
जय जय वीणावादनी।
जय वीणा की झंकार।।

सजने लगी धरा अब पावन।
आया बसंत अब मनभावन।।
पतझड़ बीते बसंत आता।
जीवन चक्र यह समझाता।।
बसंत  ने अब जैसे धरा सँवारी ।
महके कलियाँ लगती हैं प्यारी।।
सुंदरता चहुँ ओर अब छायी।
सारी धरती अब मुस्कायी।।
सजने लगी धरा अब पावन।
आया बसंत अब मनभावन।।…..
धरा सजी है दुल्हन सी सारी।
बसंत से यह लगती है प्यारी ।।
सज गयी अब यहाँ धरा हमारी।
देखो  सुंदर पीतांबर  है  धारी ।।
सुख दुःख का अहसास कराये।
पतझड़ बित बसंत आ जाये।।
पंछी भवर मधुर अब गाये।
बसंत में सब जग मुस्काये।।
श्रृंगार धरा ने बसंत में पाया ।
सजी धरा बसंत अब आया।।
सजने लगी धरा अब पावन।
आया बसंत अब मनभावन।।…

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