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वाह डीएम साहब, हल्द्वानी में किताबें पढ़ने की उम्र में पैसे कमाने वाले बच्चे भी जाएंगे स्कूल, 11 बच्चों की हुई पहचान, अभियान रहेगा जारी

प्रतीक फोटो

हल्द्वानी। जिलाधिकारी सविन बंसल के निर्देश पर श्रम ​विभाग एक्शन मोड में आ गया है। कल शहर के तमाम मुख मार्गों पर जांच पड़ताल के बाद विभाग ने 11 बच्चों को पैसे के लिए काम करते ढूंढ निकाला। इनमें से आठ गुब्बारे बेचने का काम कर रहे थे तो तीन आटो रिपेयरिंग की दुकानों पर काम कर रहे थे। इन सभी बच्चों के नाम व पतों की सूची तैयार कर ली गई है। अब स्कूल खुलने के बाद इन बच्चों को स्कूलों में एडमिशन कराया जाएगा।
मिली जानकारी के अनुसार कल शाम तक श्रम विभाग ने शहर भर में यह अभियान चलाया। आटो रिपेयरिंग की दुकानों पर काम करते पाए गए तीनों बच्चों की आयु संबंधी दस्तावेज दुकान मालिकों से मांगे गए हैं। इसके बाद उनकी आयु का निर्धारण होने पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। कम उम्र पाए जाने पर दुकानदारों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई भी संभव है। उधर गुब्बारे बेचने वाले आठों बच्चों के नाम पतों की सूची तैयार की गई है। जिनके परिजनों से संपर्क किया जा रहा है। स्कूल खुलने पर इन सभी बच्चों का एडमिशन स्कूलों में किया जाएगा। जिलाधिकारी सविन बंसल ने श्रम विभाग को बालश्रम को मजबूर ऐसे बच्चों के चिह्नीकरण के निर्देश दिए थे। ताकि उन्हें समाज की मूल धारा से जोड़ा जा सके।

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1 Comment

  1. डी०एम० साहब तो सेवक हुए। इसलिए सरकार जैसा चाहेगी, वैसा ही वो करेंगे। लेकिन डी०एम० साहब और उन के दृष्टिकोण से सहमत सभी जन यह तो बताएं कि, इन काम पर लगे बच्चों से भी बदतर हालत में लगे भिखारी बच्चों के स्वस्थ जीवन के लिए उनकी क्या योजना है? ठीक है, बच्चों से कम उम्र में काम लेना गलत है, यह उनका शारीरिक शोषण है। पर यदि यह बच्चे, जिनमें से बहुत से अनाथ भी होंगे, कुछ भी कमाएंगे नहीं तो जीवित कैसे रहेंगे? उनके बालपन तक पेट भरने का उत्तरदायित्व यदि शासन उठा ले, फिर भी उनके माता पिता, छोटे भाई बहनों का उत्तरदायित्व, उन बच्चों, जिनको पैसे कमाने के लिए ही बड़ों ने उनको इन कामों पर लगाया, के सिवा और कौन उठाएगा?

    एक गंभीर प्रश्न और भी है। आप निर्धन और बेचारे बच्चों के लिए तो ऐसा कदम तुरंत उठा लेते हैं, पर ऐसा ही निर्णय मध्य और उच्च वर्गीय परिवारों के लिए क्यों नहीं लेते? ऐसे बहुत से मध्य और उच्च वर्गीय परिवार हैं, जो अपने बच्चे तो छोड़िए, शिशुओं को भी, तमाम फिल्मों और विज्ञापनों में प्रयोग कर, खूब पैसा ऐंठने रहे हैं। और यूट्यूब जैसी साइटों की तो बात ही छोड़ दीजिए। इनमें काम करने वाले बच्चों को तो आपने कभी कोई दण्ड नहीं दिया। गरीब बच्चों को दण्ड, और अमीर बच्चों को पैसा कमाने की पूरी छूट क्यों? या तो अमीर बच्चों का भी किसी भी प्रकार व्यावसायिक उपयोग बंद करें, या फिर गरीब बच्चों को भी पैसे कमाने की पूरी छूट दें।

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