केसर का पौधा

डा राजेन्द्र कुकसाल
rpkuksal.dr@gmail.com

केसर Saffron की खेती कर अधिक आर्थिक लाभ का प्रलोभन देकर राज्य में विशेष रूप से पहाडी क्षेत्रौ में ठगी की जा रही है। न्यूज़ पेपर, व्हाट्स ऐप ग्रुप, फेसबुक,यूट्यूब आदि के माध्यम से केसर उत्पादन की खबर / सफलता की कहानी देखने को मिल रही है। कई कृषकों ने तो केसर की सफल खेती के video भी वनाये है। ऐसा ही एक video कोटद्वार से श्री अनिल बिष्ट जी का मैंने देखा जिसमें उनके द्वारा बताया जा रहा है कि कोटद्वार में उनके द्वारा सफलता पूर्वक केसर का उत्पादन किया गया है। इसी प्रकार की सफलता की कहानियां पिथौरागढ़, टेहरी जनपद के चम्बा,कीर्तीनगर, रुद्रप्रयाग जनपद के भीरी चन्द्रापुरी आदि क्षेत्रों से मिली हैं।

इस तरह की सफलता की कहानियों से अन्य कृषक भी भ्रमित होते है। इस केसर को अमेरिकन केसर के नाम से प्रचारित प्रसारित किया जा रहा है। विद्यादत्त पेटवाल, रजाखेत जनपद टेहरी गढ़वाल ने भी अवगत कराया कि कुछ लोगों के प्रभाव में आकर उन्होंने भी केसर की खेती समझ कर नकली केसर का उत्पादन किया जिससे उन्हें आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ा।




अमेरिकन केसर जैसी कोई चीज होती ही नहीं है. यह नाम सिर्फ किसानों को गुमराह करने के लिए कहा जाता है। जिस केसर को अमेरिकन केसर नाम दिया गया है वह वास्तव मैं Safflower कुसुम या करड़ी वैज्ञानिक नाम – Carthamus tinctorius का पौधा होता है इसके बीजों से सफोला तेल बनता है। इसके बीज 25-30 रुपये किलो में आसानी से मिल जाते हैं इसी कुसुम के फूलों का पुंकेसर और स्त्रीकेसर अमेरिकन केसर के नाम से प्रचारित किया जा रहा है. इसको ही अमेरिकन केसर बोलकर इसकी कीमत 50 हजार रुपये प्रति किलो के भाव बताये जाते है. ऊँचे लाभ का लालच देकर 25 रुपये किलो का कुसुम का बीज नब्बे हजार रुपये किलो में बेच दिया जाता है इस तरह की केसर का कोई बाजार नहीं है बहुत से किसान इस अमेरिकन केसर के शब्दजाल में फंसकर ठगे जा चुके हैं. इन किसानों के पास ऐसा नकली केसर पड़ा है, जिसके कोई खरीददार नहीं मिल रहे हैं. इन किसानों को उस भूमि में नकली केसर उगाने के चक्कर में कोई फसल न ले पाने से नुकसान तो हुआ ही साथ ही साथ श्रम और धन का अपव्यव भी होता है।

वास्तविक केसर Saffron वैज्ञानिक नाम- Crocus sativus के उत्पादन के अनुकूल जलवायु हमारे देश में केवल काश्मीर- श्रीनगर के आस-पास है जहाँ इसका उत्पादन किया जाता है यह प्याज के कंदो की तरह लगाया जाता है जिसमे बैगनी रंग के फूल आते हैं इन फूलों के अंदर स्थित मादा जननांग के वर्तिकाग्र को ही केसर कहते हैं जिसे हाथ से तोड़कर एकत्र किया जाता है।

औद्यानिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केन्द्र चौबटिया रानीखेत में 70 के दशक में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की योजनान्तर्गत केसर पर शोध कार्य हुए इसके अन्तर्गत काश्मीर से केसर के बल्व मंगाये गये प्रथम बर्ष इन बल्वौ से केसर प्राप्त हुआ किन्तु आगामी बर्षौ में केसर प्राप्त नहीं हुआ कई बर्षौ के शोध के बाद यही निष्कर्ष निकला कि उत्तराखंड राज्य में केसर का व्यवसायिक उत्पादन सम्भव नहीं है।

कृषकौ से अनुरोध है कि वे नकली केसर की खेती के चक्कर में न पड़ें स्वयंम जागरूक बने और अन्य कृषकों को भी जागरूक करें।

मोबाइल नंबर
9456590999

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