⏩ शारदा पब्लिक स्कूल के विद्यार्थियों ने किया योगाभ्यास

सीएनई रिपोर्टर, अल्मोड़ा

अल्मोड़ा का प्रसिद्ध टैगोर हाउस आज शारदा पब्लिक स्कूल के विद्यार्थियों के योग शिविर का गवाह बना। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की सार्थकता को छात्र—छात्राओं ने महा कवि रवींद्रनाथ टैगोर को याद करते हुए सिद्ध किया।


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महाकवि टैगोर को किया याद

योग शिविर के मौके पर शारदा पब्लिक स्कूल के बच्चों को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि कहा जाता है कि योग का अभ्यास 5 वीं शताब्दी से किया जाता रहा है। उन्होंने महाकवि टैगोर का जिक्र करते हुए कहा कि बहती हुई संरचना वह घर है जहां कवि और विचारक रवींद्रनाथ ने अपने महाकाव्य ‘गीतांजलि’ के कुछ अंश लिखे थे। कभी बेर, खुमानी, आडू और सेब के पेड़ो से लदी हरी-भरी भूमि, एक उभरते कवि उर्वर कल्पना को पंख देती है।

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प्रधानाचार्या श्रीमती लखचौरा व प्रशिक्षकों का मिला मार्ग निर्देशन

इस मौके पर प्रधानाचार्या विनीता शेखर लखचौरा, योग शिक्षक चंदन बिष्ट, प्रशिक्षक और कई छात्र कार्यक्रम के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए उपस्थित थे। इस मौके पर छात्र—छात्राओं ने वार्म अप, व्यायाम, बैठने और खड़े होने के आसन किए। प्रशिक्षकों ने योग के लाभों पर एक छोटी कक्षा दी और योग की उत्पत्ति के इतिहास की जानकारी दी। योग को भारत की प्राचीन परंपरा की देन बताया।

इससे पूर्व कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत प्रधानाचार्या श्रीमती विनीता शेखर लरखचौरा एवं पूर्व नगर पालिका सभासद अल्मोडा हेम तिवाड़ी ने संयुक्त रूप से की। इस अवसर पर अनीता पवार, मनोज पाण्डे तथा विद्यालय का समस्त स्टॉफ भौजूद था।

इतिहास के आइने में टैगोर भवन : 1937 में अल्मोड़ा आये थे महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर

महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर मई 1937 में प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक स्व. बोसी सेन के मेहमान बनकर अल्मोड़ा आए और उन्होंने यहां छावनी क्षेत्र में स्थित खूबसूरत टैगोर भवन में कई दिन गुजारे थे। गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर को पहाड़ का आतिथ्य खूब भाया था। महाकवि को पहाड़ के अल्मोड़ा की आबोहवा इतनी पसंद आई कि उन्होंने यहां कई दिनों तक साहित्य साधना की और इस दौरान उन्होंने सेजुति, नवजातक, आकाश-प्रदीप आदि रचनाओं को अंतिम रूप दिया। यहीं पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर 1937 में मई-जून आधुनिक विज्ञान पर आधारित ग्रंथ ‘विश्व परिचय’ की रचना भी की थी। इसके साथ ही गुरुदेव टैगोर ने सुप्रसिद्ध महाकाव्य गीतांजलि के कुछ अंश भी यही अल्मोड़ा प्रवास के दौरान लिखे थे। अंग्रेजों के शासनकाल में बने इस भवन को तब सेंट मार्क्स हाउस के नाम से जाता जाता था. वर्ष 1961 में टैगोर शताब्दी वर्ष के मौके पर इसे टैगोर भवन का नाम दिया गया. जो वर्तमान में छावनी परिषद अल्मोड़ा का ऑफिस है।

उल्लेखनीय है कि जिस कमरे के सोफा में बैठकर गुरुदेव ने ग्रंथों की रचना की थे, उन्‍हें वहां आज भी सुरक्षित रखा गया है। कहा जाता है कि महात्मा गांधी और गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर में अच्छी वैचारिक मित्रता थी। 1929 में कुमाऊं यात्रा पर पहुंचे महात्मा गांधी ने वापस लौटने के बाद शिक्षा, साहित्यिक एवं संस्कृति नगरी का जिक्र गुरुदेव टैगोर से किया था। प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक प्रो. बोसी सेन उन दिनों अल्मोड़ा में ही थे। तब जब कविगुरु को न्यौता भेजा गया तो वह तत्काल अल्मोड़ा पहुंच गये।

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