अल्मोड़ाउत्तराखंड

सड़क दुर्दशा-1: हठधर्मिता की भेंट चढ़ रही सड़कें, चमड़ी उधड़ी, नालियों का नामोनिशां मिटा, मुश्किल में सफर

अल्मोड़ा, 23 अगस्त। लंबा वक्त गुजर गया और सड़कों का जो नजारा दिख रहा है, उससे यही इंगित हो रहा कि सड़कें लावारिश सी छोड़ दी गई हैं। ये हाल अल्मोड़ा जिले की सड़कों का है, जहां के कई जनप्रतिनिधि सरकार में शामिल हैं। ग्रामीण क्षे़त्रों की सड़कों की छोड़िए, जिला मुख्यालय के आसपास ही सड़कों की दुर्दशा साफ दिख रही है। सड़कों की दशा सुधारने को आवाज उठ रही है, मगर सुधार के नाम पर चुप्पी। खास बात ये है कि इन्हीं सड़कों से समय-समय पर जनप्रतिनिधि, मंत्री और जिम्मेदार अफसर गुजरते हैं, मगर उन्हें सड़कों की दुर्दशा नजर नहीं आती।
अल्मोड़ा जिलांतर्गत सड़कों का हाल ये है कि बगैर हिचकोले खाए और धूल फांके सफर करना दुष्कर हो गया है। बरसात में पानी भरने से सड़कों पर पैदल चलना सिरदर्दी है। सर्वाधिक दुखदाई तो इन खस्ताहाल सड़कों से गर्भवती महिलाओं और मरीजों का सफर है। वह सड़क चाहे राष्ट्रीय राजमार्ग हो या लोनिवि के किसी खंड की। सब में पेंच हैं। अल्मोड़ा जिला मुख्यालय के इर्द-गिर्द ही राष्ट्रीय राजमार्ग का हिस्सा क्वारब-अल्मोडा-कोसी-रानीखेत सड़क, अल्मोडा-घाट मोटरमार्ग, अल्मोडा में रानीधारा, कसारदेवी, कफड़खान, एलआर साह रोड, शैल सड़क, जीजीआईसी लिंक रोड व गैस गोदाम लिंक मार्ग आदि आंतरिक सड़कों का हाल बुरा है। इसके अलावा जिलांतर्गत तमाम सड़कें हैं, जो सुधार, मरम्मत या डामरीकरण को तरस गई हैं। जगह-जगह सड़कों की चमड़ी उधड़ गई है। बड़े-बड़े गड्ढे दुर्घटनाओं का न्यौता दे रहे हैं। कहीं किनारे की दीवारें साफ हैं, तो कहीं इस बरसात में नालियों का नामोनिशां मिट चुका है। बरसाती पानी से बरसात में सड़क तलैया बन रही है।

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कहीं झाड़ियों के आगोश में सड़कें समाई हैं। मगर हठधर्मिता ऐसी जैसे जनसरोकारों से किसी को कोई लेना देना नहीं हो। सिर्फ कुछ जगहों पर मिट्टी से गड्ढे पाटकर जिम्मेदारी की इतिश्री जरूर हो रही है। यूं तो जिम्मेदार महकमे को स्वयं ही सड़कों की हिफाजत कर लेनी चाहिए या सुधार कार्य करना चाहिए। लेकिन हद और हठधर्मिता का आलम ये है कि सड़कों को सुधारने की पुरजोर मांग के बावजूद सड़कों में जरूरत के मुताबिक डामरीकरण, मरम्मत, सुधार के कार्य नहीं हो पा रहे हैं। जो बेहद चिंतनीय स्थिति है। इससे जनाक्रोश उभर रहा है। यदि ऐसा ही हाल रहा, तो शासन-प्रशासन को जबर्दस्त जनाक्रोश का सामना करना पड़ सकता है।

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