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…तो क्या कत्यूर वंशियों से छिन जायेगी राजमाता जियारानी की तीर्थस्थली ! विद्युत शवदाह गृह का विरोध नहीं, शताब्दियों से चले आ रहे जागर स्थल के छिनने से हैं आहत ! पढ़िये पूरी ख़बर

हल्द्वानी। नगर निगम हल्द्वानी द्वारा कत्यूरी धार्मिक स्थल रानीबाग में शताब्दियों से चली आ रहे जागर स्थल पर विद्युत शवदाह गृह के निर्माण को लेकर कत्यूरी समाज में गहरा आक्रोश है। जहां कत्यूर वंशी इसे अपनी आस्था और विश्वास पर कुठाराघात मान रहे हैं, वहीं समाज का एक वर्ग ऐसा भी है, जो विरोध करने वालों पर विकास कार्य में रोढ़ा अटकाने का आरोप लगा रहा है। आंखिर मामले की पूरी सच्चाई क्या है। इसको जानना बेहद जरूरी है।

दरअसल, इस वह मैदान है, जहां शताब्दियों से कुमाऊं, गढ़वाल व नेपाल से कत्यूरी जागर आयोजन व अपनी पूजा के लिए आते रहते हैं। राजमाता जिया कत्यूरी समाज ने स्पष्ट किया है कि उनकी निर्माण कार्य में कोई आपत्ति या विरोध नहीं है उनका कहना इतना भर है कि चयनित मैदान जहां कत्यूरी के पूजन व जागर स्थल हैं, उसकी बजाए ठीक नीचे उपलब्ध पर्याप्त भूमि में इन शवदाहगृह का निर्माण किया जाए। ज्ञातव्य हो कि रानीबाग में नगर निगम कत्यूरी समाज के जागर वाले विस्तर्त क्षेत्र में विद्युत शवदाह गृह व अन्य सामान्य शवदाहगृह का निर्माण कर रहा है, जिसका टेंडर भी हो चुका है।

यह हैं ऐतिहासिक तथ्य
ऐतिहासिक तथ्यों का यदि अवलोकन करें तो इस स्थान का नाम रानीबाग राजमाता जिया की कर्मस्थली तपस्थली व समाधिस्थली के रूप में पड़ा है। कुमाऊं के इतिहास में बद्रीदत्त पाण्डेय के अनुसार रानीबाग में कत्यूरी राजमाता जियारानी का बाग था, जो कत्यूरी राजा धामदेव की माता थी। यही नही स्कन्द पुराण के मानस खंड में भी इस स्थल का उल्लेख आता है। पुराणों में जो पुष्पभद्र, गार्गी चित्रशिला, चित्रहद, भद्रवद और मार्केण्याआश्रम का ​जो जिक्र आता है वह यहीं स्थित है। नदी की धारा में जो विविध रंगों की शिला है उसे ही चित्रशिला कहा जाता है और चित्रशिला से उत्तर नदी में जो स्वाभाविक कुण्ड बन गया है उसे ही चित्रहरद तीर्थ कहा जाता है। इस तीर्थस्थली में उत्तरायणी पर्व पर मुख्य मेला लगता है। राजा पृथ्वीपाल (प्रीतमदेव) की पत्नी ही महारानी ही जियारानी थी। उनका मूल ना मौलादेवी था। जिनके नाम पर रानीबाग का इतिहास भी समाहित है और जो भूमि ​सदियों से कत्यू​र वंशियों की तीर्थ व पूजन स्थली रही है। आज उसी तीथस्थली के छिन जाने का भय व्याप्त है।

13 वीं शताब्दि से रहा है महत्व
कत्यूरी समाज का कहना है कि इस स्थान पर उबड़—खाबड़ भूमि के होते हुए भी वह और उनके पूर्वज सदियों से कत्यूरी रानी मां जिया को श्रद्धा स्वरुप जागर यहां जागर आयोजन कर पूजते रहे हैं। यह स्थली रानीबाग ही मां रानी जिया के नाम पर प्रसिद्ध है, जहां पर रानी ने तप व विदेशी तुर्कों के खिलाफ युद्ध किया था और यहीं समाधि ली थी। इसका महत्त्व प्राचीन तेरहवीं शताब्दी से है। इसके अतिरिक्त कत्युरी समाज जिसमें हर जाति आती है। लगातार अपने धार्मिक भावनाओं के कारण व हर पवित्र स्नान दिवस पर रानीबाग में स्नान व जागर के लिए आते रहते हैं। यही कारण है कि समस्त कत्यूरी समाज इस शवदाह गृह निर्माण के विरुद्ध है और इसे अन्यत्र स्थापित करने की मांग कर रहा है।

हरिद्वार की तरह पवित्र तीर्थस्थल बनाने का प्रयास
कत्यूरी समाज इस पूरे ऐतिहासिक मैदान को तीर्थस्थली के रूप में विकसित करने की मांग कर रहा है। ​जहां कत्यूरी जागर के लिए अलग—अलग धुनीयां व अलग—अलग बैठने के लिए मचान, मां जिया मंदिर, भगवान मलिकार्जुन, कार्तिकेय, गोलज्यु मंदिर और कत्यूरी प्रसिद्ध शासकों के मंदिर, भव्य धर्मशालाएं, कत्यूरी शोध संस्थान, संग्रहालय इत्यादि का निर्माण हो। जिससे कि रानीबाग को हरिद्वार की तरह तीर्थ स्थल बनाया जा सके।

हर गांव—तहसीलों से सीएम को ज्ञापन
राजमाता जिया कत्यूरी समाज के उपाध्यक्ष चंदन सिंह मनराल ने बताया कि रानीबाग स्थित कत्यूरियों के जागर व पूजन स्थली की बजाए अन्यत्र विद्युत शवदाह गृह बनाये जाने की मांग को लेकर प्रत्येक ग्राम, ब्लाक, तहसील व जिलों से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजे जा रहे हैं। कत्यूरी समजा इस विद्युत शवदाह गृह के विरूद्ध नही है, सिर्फ इसे अन्यत्र स्थापित करने की मांग कर रहा है।

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