जिस प्रकार मनुष्य और ईश्वर दोंनो ही साढे़ तीन अक्षर के अक्षर हैं, लेकिन मनुष्य ईश्वर पर निर्भर है। वैसे ही विद्यार्थी और शिक्षक दोनों तीन अक्षर के शब्द होने के बावजूद शिष्य शिक्षक पर निर्भर है….

ऐसी अनेक चीजें लिखने का कोई फायदा नहीं, क्योंकि ये सब एक शिष्य, लेखक का दिमाग लिख रहा है न की उसका मन। अगर मैं अपने भाव प्रकट करूं तो एक शिक्षक ही है जो बच्चों को जीवन जीने की कला सिखाता है, क्योंकि अपनी दिनचर्या में बच्चा अनेक शिक्षकों से मिलता है और जिसमें हर किसी का अलग व्यवहार, पढा़ने का अलग तरीका होता है। जिससें बच्चा अलग-अलग तरह के माहौल में जीना सिखता है। साथ ही शिक्षक द्वारा दी गई शिक्षा का कोई मोल नहीं, परन्तु आज के समय में शिक्षक और शिष्य को जोड़ने वाला प्रेम रूपी धागा धन के तार से बदल गया है, लेकिन अब भी ये पूरा संसार शिक्षक पर निर्भर है और सदैव रहेगा। एक शिक्षक अपने शिष्य को सिर्फ पढा़-लिखा ही नहीं बल्कि समाज में रहना भी सिखाता है। ईश्वर के बाद शिक्षक ही है जो संसार में हर जगह व्यापत है। शिक्षक की दी हुई शिक्षा के सामने माता-पिता की परवरिश भी नाकाम हो जाती है।

इन सब कारणों से ही आज समाज में शिक्षक अपनी एक अलग पहचान बनाये हुये हैं। इस ईश्वर समान शिक्षक का सम्मान करने के लिए हम अपने जीवन का एक विशेष दिन 5 सितंबर शिक्षकों को समर्पित करते हैं।




  • शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं

शिवांश भट्ट, कक्षा- 8
शारदा पब्लिक स्कूल अल्मोडा़

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