• तालिबान में 33 मंत्रियों की सरकार, पर मान्यता कौन दे ?
  • शुरू हुए औरतों और पत्रकारों पर जुल्म
  • वायरल तस्वीरें बयां कर रही अफगानिस्तानी जनता का दर्द
  • शिक्षा मंत्री का बयान, ”ज्यादा पढ़ना सही नहीं हम भी तो ​कम पढ़े—लिखे”
  • खेल मंत्री बोले, ”महिलाओं को खेलने की इजाजत नही, लोग फोट खींच लेंगे”

आखिरकार 33 मंत्रियों वाली तालिबानी सरकार का गठन हो चुका है। अब तालिबान को विश्व के अन्य सभी देशों से उसे स्वतंत्र देश और सरकार के रूप में मान्यता ​की दरकार है। जाहिर सी बात है कि तालिबान ने भले ही अफगानिस्तान में जंग जीत ली हो, लेकिन उसकी जीत तब तक अधूरी है, जब तक विश्व के बड़े देश उसकी सरकार को मान्यता नही दे देते। बावजूद इसके तालिबान सत्ता सम्भालने के साथ जो हरकतें करने लगा है, उससे यह कतई दिखाई नही देता कि उसने अपनी चाल, चरित्र और चेहरे को जरा भी बदलने का प्रयास किया है। News WhatsApp Group Join Click Now

अफग़ानिस्तान में तालिबान ने सरकार बनाने के बाद जो दावे पेश किये थे, वह हकीकत में कहीं दिखाई नही दे रहे हैं। प्रमुख न्यूज ऐजेंसियों और विश्वस्त मीडिया चैनलों की रिपोर्ट की मानें तो तालिबान ने अब कोड़े बाहर निकाल लिये हैं। उसके लिए अफगानी जनता उसकी प्रजा नही गुलाम है। यहां तालिबान के खिलाफ बोलने वालों की कोड़े मार खाल उधेड़ी जाने लगी है।

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बार—बार तालिबानी आतंकी कह रहे थे​ कि उसके शासन में औरतों को पूरी आज़ादी मिलेगी, लेकिन जो तस्वीरें गत 7 सितंबर की सोशल मीडिया में वायरल हुई हैं, उसने तालिबान का असली चेहरा ​एक बार फिर दुनियां के सामने ला दिया है। दुनियां जानना चाहती है कि तालिबान में 33 मंत्रियों की सरकार गठित होने के बाद के चंद दिन कैसे गुजरे ? तो जान लीजिए यहां आतंकी सरकार गठित होते ही कहीं महिलाओं को सरेराह कोड़े मारे गये तो कहीं पत्रकारों की पीठ पर इतने कोड़े मारे कि वह अब लिखना या वीडियो शूट करना तो दूर चलने—फिरने के लायक तक नही रह गये हैं।

तालिबान : चाल, चरित्र और चेहरा ! औरतों को कहा “खरबूजा”, पत्रकारों की उधेड़ दी खाल

आखिर ऐसी हरकतें तालिबान क्यों कर रहा है ? जानकार बताते हैं तालिबान वास्तव में एक बर्बर आतंकी समूह के सिवाए कुछ नही है। संयोग से कायरों ने युद्ध का मैदान छोड़ दिया और आतंकी उस पर काबिज हो गये हैं। आने वाले सालों में ​हालात बद से बदतर हो जायेंगे। हालिया तस्वीरें जो ​मीडिया तक पहुंची हैं। उसमें देखा जा रहा है कि सड़क से गुजरती एक महिला घुटनों के बल जमीन पर बैठी है और तालिबानी उस पर कोड़े बरसा रहे हैं। वहीं अफगानी पत्रकारों पर भी हर तरह के जुल्म किये जा रहे हैं। एक तालिबानी नेता ने जो बयान दिया वह तो बेहद चौंकाने वाला है। बेशर्मी से इस नेता ने कहा कि “आप किस तरह का खरबूज़ा खरीदते हैं, कटा हुआ या फिर साबुत? बिना हिजाब की औरतें असल में कटे हुए खरबूज़े की तरह होती हैं।” News WhatsApp Group Join Click Now

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तालिबानी नेता का यह बयान उसकी सोच को उजागर कर देता है। जिसमें साफ पता चल जाता है कि तालिबान की यह तथाकथित सरकार अपने खिलाफ आवाज़ उठाने किसी को नही देगी। तालिबान के खिलाफ धरना—प्रदर्शन करने और मीडिया रिपोर्ट प्रकाशित करने वालों पर हर वह जुल्म होंगे, जिसकी शायद आप और हम कल्पना भी नही कर सकते। सबसे अहम बात तो यह है कि आने वाले दिनों में मीडिया पर इतनी पाबंदियां होंगी की उसके जुल्म की कहानियां दुनिया तक शायद पहुंच ही न सकें। बहुत सम्भव है कि आज भी वहां जो कुछ हो रहा है, उसका महज 10 प्रतिशत ही दुनिया तक मीडिया के माध्यम से पहुंच रहा है।

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देश के प्रमुख टीवी चेनल के पत्रकार शम्स ताहिर खान के शब्दों में — ”7 सितंबर की कुछ तस्वीरें सामने आई हैं। उसी सात सितंबर की जिस रोज़ अफ़गानिस्तान में तालिबानी हुकूमत की दूसरी पारी शुरू हुई। इधर, तालिबान दुनिया के सामने अपने नए-नए हाकिम और हुक्कामों की फेहरिस्त पेश कर रहा था और उधर तालिबानी हुकूमत की आमद से घबराई औरतें काबुल की सड़कों पर अपनी आज़ादी के लिए आवाज़ बुलंद कर रही थीं, लेकिन इन्हीं आवाज़ों को कुचलने के लिए तब तालिबानी आतंकी वहां की सड़कों पर अंधाधुंध गोलियां चला कर निहत्थी भीड़ को डरा रहे थे। महिलाओं को दौड़ा-दौड़ा कर उनकी पीठ पर कोड़े बरसा रहे थे। काबुल में भी ऐसा ही मंजर देखने को मिला, जहां दो पत्रकारों पर तालिबानी जुल्म देखने को मिला। पीट-पीट कर खाल उधेड़ देना किसे कहते हैं, ये इन पत्रकारों को देख कर समझा जा सकता है। अफग़ानिस्तान के स्थानीय पत्रकारों पर तालिबानी आतंकियों की खीझ सिर्फ़ इसलिए उतरी है, क्योंकि ये पत्रकार काबुल में महिलाओं के उस प्रदर्शन को कवर कर तालिबान को बेनक़ाब कर रहे थे, जिसमें महिलाओं अपनी आज़ादी की मांग कर रही थी। तालिबानी आतंकियों ने ना सिर्फ़ महिलाओं को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, बल्कि पत्रकारों पर उनके कोड़े और डंडे कुछ ऐसे बरसे कि किसी पीठ लहूलुहान हो गई, तो कई अपने क़दमों पर चलने लायक भी नहीं बचे। और ये हालत तब थी जब तालिबानी हुकूमत को अफ़ग़ानिस्तान में आए कुल जमा महज़ दो ही दिन गुज़रे थे।”

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वहीं दूसरी ओर Los Angeles Times foreign correspondent Marcus Yam ने अपने ट्वीटर हैंडल से अफग़ानी पब्लिकेशन एतिलातरोज़ के दो पत्रकारों नेमत नकदी और तकी दरियाबी की दो ऐसी तस्वीरें पोस्ट की हैं, जिन पर नज़रें टिका पाना भी मुश्किल है। तालिबानी जल्लादों ने दोनों की पीठ से लेकर जिस्म के पूरे पिछले हिस्से में इतने डंडे बरसाए हैं, ऐसा कोई भी हिस्सा नहीं है, जहां चोट और ज़ख़्म के निशान ना मौजूद हों। अपने ही पत्रकारों की इन तस्वीरों और वीडियोज़ को खुद अफ़ग़ानी पब्लिकेशन ने भी अपने ट्वीटर हैंडल से पोस्ट कर इस तालिबानी रवैये की मुखालफ़त की है। खबरों के मुताबिक 7 सिंतबर को काबुल में जारी इस विरोध प्रदर्शन की कवरेज के दौरान तालिबानी आतंकियों ने वहां मौजूद सारे पत्रकारों को अगवा कर लिया। इसके बाद उन्होंने विदेशी पत्रकारों को तो जाने दिया, लेकिन अफग़ानी पत्रकारों के साथ ऐसा बर्बर सलूक किया कि किसी भी देखने वाले की रूह कांप जाए।

अलबत्ता ताज जानकारी यह है कि तालिबानी सरकार ने फरमान जारी किया है बिना इजाजत कोई प्रदर्शन नही होगा। प्रदर्शन से पहले मकसद बताना जरूरी है। यहां गृह मंत्रालय का आदेश है कि प्रदर्शन से पहले दुनिया की नज़रों में उस घोषित आतंकवादी यानी सिराजुद्दीन हक्कानी से इजाजत लेनी होगी, जिसे तालिबान ने अपना नया गृह मंत्री बनाया है। वहीं तालिबान ने अब लड़कियों और महिलाओं के किसी भी खेल गतिविधि में हिस्सा लेने पर पाबंदी लगा दी है। तर्क यह दिया गया है कि ​खेलों में इस्लामी लिबास नही पहना जा सकता, इसलिए पाबंदी जरूरी है। अब तय है कि यहां ऑस्ट्रेलिया और अफगानिस्तान के बीच इस साल नवंबर महीने में होबार्ट में होने वाले इकलौते टेस्ट मैच शायद नही हो पाये। ज्ञात रहे कि अफगानिस्तानी सरकार में यहां 25 महिला क्रिकेटरों का आने वाले खेलों के लिए चयन हुआ था, लेकिन अब यह महिला क्रिकेटर खेलना तो दूर बल्ला हाथ में पकड़ने की हिम्मत तक नही कर सकेंगी। तालिबानियों का कहना है कि खेल के दौरान एक तो कपड़े पूरी तरह ढके नही रह सकते, वहीं महिलाओं की तस्वीरें और वीडियो भी बन जायेंगी, जिसकी वह इजाजत नही दे सकते।

अब आपको तालिबान की शिक्षा नीति के बारे में बता दें। तालिबानी सरकार ने हुक्म दिया है कि एक ही कक्षा में लड़के—लड़कियां नही बैठेंगे। अगर बहुत जरूरी हुआ तो बीच में पर्दे लगाये जायेंगे ताकि लड़के—लड़कियां एक—दूसरे को देख न सकें। सबसे मजेदार बयान तो यहां के शिक्षा मंत्री अब्दुल बाकी हक्कानी का है। उसने कहा है कि अब लोगों को उच्च शिक्षा लेने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि खुद वो और उस जैसे लोग बगैर किसी उच्च शिक्षा के ही देश के इतने बड़े पदों पर आ पहुंचे हैं। खैर, इतना कुछ जानने—समझने के बाद भी अगर कोई तालिबान का समर्थन करता है तो उसकी सोच पर सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है। यदि कोई धर्म—समुदाय के नाम पर तालिबान को अपनी कौम का मानता है तो जान लीजिए वह सबसे अधिक जुल्म अपनी ही कौम पर कर रहा है। News WhatsApp Group Join Click Now

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