• शहरफाटक का विष्णु मंदिर
  • दर्शन सिंह फर्तयाल ‘रंगधरी’, शहरफाटक

देश में सूर्य व विष्णु मंदिरों की बहुत सीमिति संख्या है। विगत दिनों हमने आपको अल्मोड़ा के कटारमल से अतिरिक्त गुणादित्य के सूर्य मंदिर के बारे में बताया था। आज हम एक ऐतिहासिक विष्णु मंदिर के बारे में आपको बताने जा रहे हैं। अल्मोड़ा जनपद के लमगड़ा विकासखंड के शहरफाटक में स्थित यह विष्णु भगवान का मंदिर एक ऐतिहासिक मंदिर है और अपार श्रद्धा का केंद्र है। यह जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी की दूरी पर स्थिति है। विडंबना यह है कि ​तकनीकी कारणों से पुरातात्विक विभाग द्वारा इसे ऐतिहासिक व संरक्षित धरोहरों की श्रेणी में नहीं रखा जा सका है। वहीं पर्यटन नक्शे में भी इस मंदिर का जिक्र नहीं हो पाया है। इसके बावजूद इस मंदिर के प्रति लोगों में अपार आस्था है और पर्यटक यहां दर्शन हेतु पहुंचते हैं — सं.

अल्मोड़ा जिले के अंतर्गत लमगड़ा ब्लाक के ग्राम डोल शहरफाटक में सदाबहार हरे-भरे देवदार के घने वृक्षों के बीच स्थित है श्री विष्णु मंदिर। यह पावन मंदिर उत्तर भारत के प्रमुख विष्णु मंदिरों में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाये हुए है। प्राचीन समय में इसे नागद्यौ नाम से जाना जाता था। इस मंदिर की धर्मिक मान्यतायें स्कन्द पुराण-मानस खंड के 58 वें अध्याय में इस प्रकार है –

दारूकानन संलग्नो नाम्ना शाल्मती पर्वतः
पश्चिमे मुनि शाइला राजते नाम संशयः
अन्नापुण्याः सुसरितो बहतः सन्ति वै दिजाः
तपस्विनो महाभागाः सत्य धर्म परायण।।


अर्थात सालम पर्वत के पश्चिम में पद्मगिरि नामक स्थान में श्री विष्णु भगवान का मंदिर है, जहाँ से पवित्रा नदियां बहती हैं। जहां पर सत्यव्रती मुनियों एवं शिव ब्रह्मा का निवास है। वास्तव में यहां श्री विष्णु, शिव, ब्रह्मा के मंदिर हैं तथा कई स्थानों से जल धराएं प्रवाहित होती हैं। यहां पर श्री विष्णु जी की चरणों से निकली नदी को पद्मपर्णा, पदमावती कहा जाता है। जनश्रुति के अनुसार यहां सूर्यकुंड से एक रत्ती सोना प्रतिदिन प्रातःकाल एवं संध्या काल में बहता है। यहां से पनार नदी का उद्गम स्थान माना जाता है। पनार नदी अत्यंत पवित्रा मानी जाती है। स्कन्द पुराण मानस खंड में इसकी पवित्राता इस प्रकार बताई गई है –

निमज्यं पर्णपत्रायां त्रिरात्रां ये चरन्ति हि
ते यान्ति विष्णुः सदनं पुनरावृति दुर्वाभम्

अर्थात् पनार (पदमावती नदी) में लगातार तीन दिन स्नान से मोक्ष प्राप्त होता है, विष्णु लोक प्राप्त होता है तथा पुनर्जन्म नहीं होता। पुराणों में वर्णित राजा जनमेजय का नाग यज्ञ, इसी नागद्यो नामक स्थान में हुआ है। राजा जनमेजय द्वारा जब समस्त नागों का यज्ञ किया जा रहा था तब एक नाग अपने प्राण बचाने देवराज इंद्र के पास चला गया तथा इंद्रदेव से अपने वंश को बचाने की याचना की व इंद्र के सिंहासन में छुप गया। राजा जन्मेजय ने देवराज इंद्र से नाग यज्ञ हेतु मांगा पर इंद्र ने शरणागत की रक्षा करते हुए नाग देने से इंकार कर दिया और नाग को अभयदान दे दिया। तब राजा जन्मेजय को क्रोध आ गया। उसने यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों से इंद्र को सिंहासन सहित होम कर देने को कहा। ब्राह्मणों के तप से इंद्र सिंहासन सहित नागद्यो नामक स्थान में आ गये। इस प्रकार के अनर्थ को बचाने के लिए यहां पर स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, महेश प्रकट हो गये। उन्होंने चैरासी लाख योनियों में से एक योनि सांप वंश के समाप्त होने पर चिंता प्रकट की तथा जन्मेजय को समझाया तब ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के बीच बचाव से नाग की रक्षा हो सकी, लेकिन सांप जाति को श्राप दिया गया कि जा आज से तू बच्चों को स्वयं खा लेगा। लोक कहावत भी है कि सांप अपने बच्चे स्वयं खा लेता है।

इसी मंदिर से लगा हुआ कुछ दूरी पर एक बहुत बड़े पत्थर की गुफा है। जिसे ‘नागचुला’ कहा जाता है। प्राचीन समय में श्री विष्णु मंदिर के अंदर से नागचुला तक अंदर ही अंदर रास्ता था, जिससे होकर पुजारी दोनों जगह पूजा करता था। परंतु वर्तमान में गुफा में मात्र रास्ता निशान के रूप में है। जिसे स्पष्ट कर पाना कठिन है। इस मंदिर के निर्माण के बारे में कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं, न ही कोई पुरातात्विक धरोहर है। जन श्रुति है कि सदियों वर्ष पूर्व भाजा और भूप सिंह, फर्तयाल जाति के दो भाईयों ने लोहाघाट से यहां आकर यह श्रमदान से बनवाया और यहीं बस गये। बाद में नव निर्माण लोगों द्वारा किये गए है। जिससे प्राचीन पुरातात्विकता का मापदण्ड समाप्त हो गया। जिस कारण पुरातन विभाग के रजिस्ट्रेशन के अंतर्गत यह मंदिर नहीं आ सका और ना ही पर्यटन के मानचित्र पर। पत्रकारों व साहित्यकारों द्वारा इस मंदिर की पवित्राता को समय-समय पर प्रकाशित करने से लोग यहां बड़ी संख्या में आ रहे हैं। यह मंदिर भविष्य में पर्यटन का प्रमुख आकर्षण एवं धर्मिक आस्था का पावन संगम बनेगा।

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